सादर अभिवादन।
बैंकों की मनमानी पर आज विचार करते हैं।
8 नवम्बर 2016 को नोटबंदी / नोटबदली की घोषणा जैसा तूफ़ान देश ने झेला। इसके बाद बैंकों (अधिकोषों) ने अपने ग्राहकों से विभिन्न सेवाओं के लिए मनमाने शुल्क बसूलना आरम्भ किये। इनमें एक शुल्क है
MAB ( Minimum Average Balance) .
वित्त मंत्रालय की साइट पर भारतीय स्टेट बैंक की ओर से पिछले वर्ष अप्रैल से नवम्बर तक 1771.67 करोड़ रुपये खातों में न्यूनतम जमा राशि को न रख पाने के कारण ग्राहकों से बसूले गए हैं , यह आंकड़ा उपलब्ध है।
ज़रा सोचिये बैंक खाते में न्यूनतम जमा राशि को न बनाये रखने में कौन लोग अक्षम हैं ? यह राशि किन लोगों से बसूली गयी होगी ..... निःसंदेह वह ऐसा वर्ग है जो लुट-पिटकर भी चुप है क्योंकि सत्ता के केंद्र का संवेदनाविहीन होते जाना अब महसूसने लगे हैं लोग।
राज्य (व्यवस्था) का पूँजीवादी चेहरा यही होता है।
इस दुनिया से अलग एक सृजन की दुनिया है जहाँ मूल्यों,विसंगतियों और मानवता पर चिंतन होता है आइये अब आपको उसी की सरस, मधुमय सैर पर ले चलते हैं ताकि तल्ख़ी पर मरहम लगाया जा सके.....
चित्र को कविता में बदलने में माहिर हैं
आदरणीया डॉक्टर इंदिरा गुप्ता जी,
एक बानगी पेश-ए-नज़र है-
8 नवम्बर 2016 को नोटबंदी / नोटबदली की घोषणा जैसा तूफ़ान देश ने झेला। इसके बाद बैंकों (अधिकोषों) ने अपने ग्राहकों से विभिन्न सेवाओं के लिए मनमाने शुल्क बसूलना आरम्भ किये। इनमें एक शुल्क है
MAB ( Minimum Average Balance) .
वित्त मंत्रालय की साइट पर भारतीय स्टेट बैंक की ओर से पिछले वर्ष अप्रैल से नवम्बर तक 1771.67 करोड़ रुपये खातों में न्यूनतम जमा राशि को न रख पाने के कारण ग्राहकों से बसूले गए हैं , यह आंकड़ा उपलब्ध है।
ज़रा सोचिये बैंक खाते में न्यूनतम जमा राशि को न बनाये रखने में कौन लोग अक्षम हैं ? यह राशि किन लोगों से बसूली गयी होगी ..... निःसंदेह वह ऐसा वर्ग है जो लुट-पिटकर भी चुप है क्योंकि सत्ता के केंद्र का संवेदनाविहीन होते जाना अब महसूसने लगे हैं लोग।
राज्य (व्यवस्था) का पूँजीवादी चेहरा यही होता है।
इस दुनिया से अलग एक सृजन की दुनिया है जहाँ मूल्यों,विसंगतियों और मानवता पर चिंतन होता है आइये अब आपको उसी की सरस, मधुमय सैर पर ले चलते हैं ताकि तल्ख़ी पर मरहम लगाया जा सके.....
चित्र को कविता में बदलने में माहिर हैं
आदरणीया डॉक्टर इंदिरा गुप्ता जी,
एक बानगी पेश-ए-नज़र है-

सधे हुऐ
कदमो से नित
जल भर
कर लाती
हूँ मैं
बोल अनसुने
लब पर रखती
कुंतल काँधे
बिखेरती
हूँ मैं !
सृजन में नये-नये प्रयोग हमें अनायास ही आकर्षित करते हैं।
आदरणीया श्वेता सिन्हा जी की ताज़ा कविता का रंग कुछ ऐसा है
कि सभी को भा जाय, कल्पनाशक्ति का
शानदार नमूना देखिये -
आदरणीया श्वेता सिन्हा जी की ताज़ा कविता का रंग कुछ ऐसा है
कि सभी को भा जाय, कल्पनाशक्ति का
शानदार नमूना देखिये -

जानता हूँ मैं
तुम भी ठंड़ी छत की
नम मुँडेरों पर खड़ी
उनींदी आँखों से
देखती होओगी चाँद को
एक चाँद ही तो है
जिसे तुम्हारी आँखें छूकर
भेजती हैं एहसास
जो लिपट जाते हैं मुझसे
आकर बेधड़क,
और छोड़ जाते हैं
गहरे निशां
तुम्हारी रेशमी यादों के ।
ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव हमारे लिए बहुत कुछ अंकित कर देते हैं। आदरणीया शकुंतला शकु जी की प्रस्तुति मुलाहिज़ा कीजिये -
जिंदगी मुझसे तेरा बोझ उठाते न बने….शकुंतला शकु
जहाँ से चाह कर भी लौट के आते न बने
शौक़िया रहमों करम खुद को गवाँरा न हुआ
फिर भी जीने का नया ढंग बनाते न बने
शब्दों और भावों में नवीनता की तलाश में जुटे रहते हैं
आदरणीय पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा जी...
पेश है उनकी मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति -
4
जो छोड़ गए हैं तन्हा….पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा
एहसास मर जाते हैं तन्हाई में,
एहसास का स्पंदन साथ ढूंढ़ता है प्रीत का।
वर्ना जीवन तिल-तिल मरता है।
साँसों के आने जाने से केवल,
जीवन कहाँ चलता है?
ग़ज़लकारी से हमें भाव विभोर करने के बाद कविता का नया रंग-रूप लेकर उपस्थित हैं आदरणीय दिगंबर नासवा जी जो हमसे कहती है कि जीवन में कविता हर तरफ़ बिखरी हुई है क़रीने से सजाओ तो सही, भावों को शब्दों में पिरोओ तो सही -
ग़ज़लकारी से हमें भाव विभोर करने के बाद कविता का नया रंग-रूप लेकर उपस्थित हैं आदरणीय दिगंबर नासवा जी जो हमसे कहती है कि जीवन में कविता हर तरफ़ बिखरी हुई है क़रीने से सजाओ तो सही, भावों को शब्दों में पिरोओ तो सही -
उम्र के छलावे ...दिगंबर नासवा
और कोने में पड़ा आदम कद टैडी-बियर
वो भी पिछले कई दिनों से उदास है
तेरे चले जाने के बाद मैं उससे लिपट के सोने लगा था
अजीब सी जिस्मानी गंध रहती है उसमें
गहरे लाल लिपस्टिक के निशानों से अटा वो टैडी-बियर
सोचता हूँ अबकी सर्दियों से पहले गरम कपड़ों के साथ
इसको भी ड्राई-क्लीन करवा लूँ
सृजन की गंभीरता लिए दार्शनिक अंदाज़ में रचती हैं रचना आदरणीया मीना गुलियानी जी,
आइये नज़र डालें उनकी एक विचारणीय रचना पर-
सृजन की गंभीरता लिए दार्शनिक अंदाज़ में रचती हैं रचना आदरणीया मीना गुलियानी जी,
आइये नज़र डालें उनकी एक विचारणीय रचना पर-
अंतिम सोपान है….. मीना गुलियानी
जीवन में उतार चढ़ाव
आते रहते हैं , आयेंगे
जीवन में हर पल को
हँसते हुए गुज़ारना है
चित्त को शांत करना है
क्षमा मांगकर क्षमादान देकर
मन एकाग्र करना है
उस विराट को पाना है
यही जीवन का लक्ष्य है
जीवन का अंतिम सोपान है
कविता मानव मन की वह अभिव्यक्ति है जो भावों को कलात्मक ढंग से कल्पना कैनवास पर उकेरती है। आदरणीया मीना शर्मा जी स्वास्थ्य लाभ के उपरान्त हाज़िर हैं अपने ब्लॉग "चिड़िया" पर रसमय
काव्य- ख़ुशबू लिए कविता की परिभाषा के साथ -
जीवन का अंतिम सोपान है
कविता मानव मन की वह अभिव्यक्ति है जो भावों को कलात्मक ढंग से कल्पना कैनवास पर उकेरती है। आदरणीया मीना शर्मा जी स्वास्थ्य लाभ के उपरान्त हाज़िर हैं अपने ब्लॉग "चिड़िया" पर रसमय काव्य- ख़ुशबू लिए कविता की परिभाषा के साथ -
कविता वह मकरंद है.....मीना शर्मा
कविता नीला वितान है,
'चिड़िया' की उड़ान है
चहक भरी !
कविता शीतल ज्योत्सना है,
पाते हैं विश्राम जिसमें
सुलगते मन !
कविता स्वयं अपना परिचय है,
शब्दों पर भावनाओं की
विजय है !!!
और अब पेश है उलूक टाइम्स की एक नायाब प्रस्तुति
जिसमें नव वर्ष के शुरूआती दिनों की हलचल
और मंथन पर विचार कीजिये -
जिसमें नव वर्ष के शुरूआती दिनों की हलचल
और मंथन पर विचार कीजिये -
सूरज चाँद तारों को भी तोड़ देते हैं सब ..... डॉ. सुशील कुमार जोशी
नाचते हुऐ
अलग अलग
अपने अपने
घरों में अलग
वैसे भी
आदमी को पूरा
एक साथ खुद में
आदमी रह कर
अब होना भी
कोई होना नहीं है ।
और चलते-चलते ईश्वर से प्रार्थना कि देश में अमन-शान्ति क़ायम रहे जातीय स्वाभिमान से बड़ा है सामाजिक एकता का भाव।
आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों के इंतज़ार में।
कल श्वेता जी से मिलना न भूलिएगा
रवीन्द्र सिंह यादव
कोई होना नहीं है ।
और चलते-चलते ईश्वर से प्रार्थना कि देश में अमन-शान्ति क़ायम रहे जातीय स्वाभिमान से बड़ा है सामाजिक एकता का भाव।
आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों के इंतज़ार में।
कल श्वेता जी से मिलना न भूलिएगा
रवीन्द्र सिंह यादव 




