प्रथम प्रस्तुति पर
सादर अभिवादन
त्योहारों का मौसम समाप्त होने को है। आपने अपने घर में बची मिठाइयों और नमकीन जो आपको पसंद नहीं, अधजली बची मोमबत्तियाँ,बची रंगोली के रंग,पुरानी बिजली के झालर और ऐसे ही आपके लिए अनुपयोगी चीजों का क्या किया???
कृपया, इन सब चीजों को फेंकने के बजाय गरीबों, जरुरतमंदों में सम्मान के साथ बाँट दे। किसी झोपड़ी में रोशनी हो जायेगी, किसी गरीब का मँहगी मिठाई खाने का सपना पूरा हो जायेगा। किसी झोपड़ी के दीवार में रंग-बिरंगी तितली,फूल बनाकर बच्चे खुश होंगे। संभव हो तो आपके और आपके बच्चों के काम न आने वाली अनुपयोगी वस्तुएँ, कपड़े, खिलौने फेंकने के बजाय समय समय पर जरुरतमंदों को ससम्मान दे दें।
चलिये मेरी पसंद की आज की रचनाओं की ओर

मौन है गर्जन है
रत है विरक्त है
शून्य है..
शब्द है पर खामोश है
नत है ..
हर ऊषा की प्रत्युषा भी
जो तूफानों में किनारे तक पहुंचा दे
ऐसी अब कश्तियाँ नहीं मिलतीं
गम को गले से लगा कर खुशी बांटे
ऐसीं जादू की झप्पियाँ नहीं मिलतीं
ख़ुद के लिये जूझने वाले इस जहाँ में
एक ढूढों तो हज़ारों मिल जायेंगे
दूसरों की खुशी के लिये जूझने वाली
आप जैसी हस्तियां नहीं मिलतीं।
ऐसी अब कश्तियाँ नहीं मिलतीं
गम को गले से लगा कर खुशी बांटे
ऐसीं जादू की झप्पियाँ नहीं मिलतीं
ख़ुद के लिये जूझने वाले इस जहाँ में
एक ढूढों तो हज़ारों मिल जायेंगे
दूसरों की खुशी के लिये जूझने वाली
आप जैसी हस्तियां नहीं मिलतीं।
याद धूप है याद छाँव है,
तड़प-ओ-ख़लिश का एक गाँव है,
याद रात है याद ही दिन है,
न फ़लक़-ज़मीं पर होता पाँव है,
हिय में हूक होती है पल-पल,
बेक़रारी में चश्म-ए-तर है।
चिलमन के पीछे जाके ... क्यूँ छुप गया है वो...
मुश्किल से जुदाई का .. हम गम गटक रहें हैं..
नज़रो से तेरी पहले ही ... बेहोश है ये दुनिया...
नींद आती नहीं है न ही..कोई ख्व़ाब फटक रहें हैं..
उड़ आए बीज कंही से;
कि लाख कोशिशों के बावजूद
उग ही आये कुछ अंकुर
बातें करने लगे हवा से
नाता जोड़ लिया इस धरा से,
गगन से और इंसानों से.......
और हम!
अपनी कोशिशों में भी हारते रहे. ....
जहाँ फैली थी मधुर चांदनी -
शीतल जल के धारों पे ,
कुंदन जैसी रात थमी थी ;
फेर आँखे जग - भर से वहां-
जो भी ख़लिश थी दिल में एहसास हो गयी है
दर्द निस्बत मुझे कुछ खास हो गयी है
वजूद हर ख़ुशी का ग़म से है इस जहाँ में
फिर जिंदगी क्यूँ इतनी उदास हो गयी है
दर्द निस्बत मुझे कुछ खास हो गयी है
वजूद हर ख़ुशी का ग़म से है इस जहाँ में
फिर जिंदगी क्यूँ इतनी उदास हो गयी है
रोज पकाया
जाता है
कुछ ना कुछ
अधपकों के
बस में बस
इतना ही
तो होता है
जो पकाने
के बाद
भी पका
ही नहीं




