सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
दिमाग साफ़ हो गया है
आस-पास के हालात देख
तड़प उठता हूँ
तड़प
चुप्पी अचानक टूटी - "तुम खामख्वाह क्रोध कर रहे हो |
इस चित्र के साथ अख़बार की भड़काऊ हेडिंग नहीं,
बल्कि कुछ अंदर का भी पढ़ लो पहले |" चाय कप में निकालती हुई सुरेखा बोली |
चाय की भाप और तल्ख भाषा से वातावारण में गर्माहट फैल गयी |
"दो मासूम को ये अख़बार वाले दिखाकर हम पर कीचड़ नहीं उछाल सकते |
इन्हें इतनी ही हमदर्दी थी तो अपने घर की छत क्यों नहीं मुहैया करवा दी |
अकेले में ‘नीर-नयन’
को दिलासा देते रहे,
वो सलामत रहे ‘अमित’
पल-पल दुआ करते रहे।
बरबादियों का अपनी किससे करूँ गिला,
कुछ बदनसीब हूँ मैं, कुछ ग़लतियाँ भी हैं।
चेहरे से समझना है मुश्किल मिज़ाज-ए-यार,
संजीदगी भी है कुछ, कुछ शोखियाँ भी हैं।
ओह! वह अबोध एहसास
भारी है अनुभवों पर
ज्ञान की बातें
शब्दों का संसार
कितना कमतर है
अकेले आवेग के बरक्स
तुमसे उम्मीद थी तुम समझोगे दर्द को,
तुम्हारी बेरुखी कर घायल जिगर गयी।
जिस झोली में प्यार के मोती थे कभी,
वो झोली गम के आंसुओं से भर गयी।
><><
मिलते ही रहेंगे
विभा रानी