बीते दिनों काशी हि'न्दू विश्वविद्यालय' में जो घटना हुई
क्या लोगों ने इसका सही आंकलन किया ?
इसके पीछे खड़े मूल को देखने का सार्थक प्रयास किया ? नहीं !
सभी ने केवल वही देखा जो मीडिया ने दिखाया ,
वही सुना जो मीडिया ने सुनाया।
कई रचनाकारों ने इस पर आधारित माफ़ कीजिएगा ,मीडिया को सत्य का आधार मानकर रचनायें भी रच डालीं।
गुस्ताख़ी के लिए पुनः क्षमा प्रार्थी हूँ।
संभवतः यह उनके मन की आवाज़ रही होगी।
मैं आपको स्मरण कराना चाहूँगा कि मन की आवाज़ सदैव सत्य हो आवश्यक नहीं। कभी -कभी आत्मसंयम भी हमारी सोच को एक नई दिशा प्रदान करती है बाक़ी आपसब स्वयं ही इतने निपुण हैं मुझे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।
क्या लोगों ने इसका सही आंकलन किया ?
इसके पीछे खड़े मूल को देखने का सार्थक प्रयास किया ? नहीं !
सभी ने केवल वही देखा जो मीडिया ने दिखाया ,
वही सुना जो मीडिया ने सुनाया।
कई रचनाकारों ने इस पर आधारित माफ़ कीजिएगा ,मीडिया को सत्य का आधार मानकर रचनायें भी रच डालीं।
गुस्ताख़ी के लिए पुनः क्षमा प्रार्थी हूँ।
संभवतः यह उनके मन की आवाज़ रही होगी।
मैं आपको स्मरण कराना चाहूँगा कि मन की आवाज़ सदैव सत्य हो आवश्यक नहीं। कभी -कभी आत्मसंयम भी हमारी सोच को एक नई दिशा प्रदान करती है बाक़ी आपसब स्वयं ही इतने निपुण हैं मुझे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।
सवाल यह है ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कैसे हुईं ?
इसके पीछे क्या कारण हैं और कारक भी ?
इसके पीछे क्या कारण हैं और कारक भी ?
सर्वप्रथम मैं आपको बता दूँ ,पिछले कुछ वर्षों के दौरान विश्वविद्यालयों में राजनीतिक पार्टियों की चुनावी दख़ल बढ़ी है। अध्ययन-अध्यापन से सरोकार न रखने वाले अध्यापक व छात्र अपनी राजनीतिक भविष्य चमकाने हेतु केवल विश्वविद्यालय आते हैं और भोले -भाले अध्ययनरत छात्रों को बरगलाते हैं। चुनाव के दौरान हॉस्टल में गहरी पैठ बनाते इन्हें देर नहीं लगती जिनका खामियाज़ा विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों को न चाहते हुए भी भुगतना पड़ता है।
इन छात्रों को छात्र न कहकर किसी तथाकथित राजनीतिक पार्टी
का सड़क छाप कार्यकर्ता कहें ज्यादा उचित होगा।
इन छात्रों को छात्र न कहकर किसी तथाकथित राजनीतिक पार्टी
का सड़क छाप कार्यकर्ता कहें ज्यादा उचित होगा।
दूसरी और सबसे अहम् बात यह है कि आजकल
विश्वविद्यालयों के माननीय कुलपति महोदयों की नियुक्ति
वर्तमान सरकार पर निर्भर करती है।
सत्ता में जो राजनीतिक पार्टी विराजमान विश्वविद्यालय उसी का।
अब चुनावी रणभेरी के दौरान विश्वविद्यालय में चुनाव का शंखनाद करने वाले प्यारेमोहनों को उचित-अनुचित कार्य करने से रोकेगा तो
विश्वविद्यालयों के माननीय कुलपति महोदयों की नियुक्ति
वर्तमान सरकार पर निर्भर करती है।
सत्ता में जो राजनीतिक पार्टी विराजमान विश्वविद्यालय उसी का।
अब चुनावी रणभेरी के दौरान विश्वविद्यालय में चुनाव का शंखनाद करने वाले प्यारेमोहनों को उचित-अनुचित कार्य करने से रोकेगा तो
कौन ?
सत्ता द्वारा नियुक्त कठपुतली सदृश्य आदरणीय कुलपति महोदय अथवा स्वयं सत्ताधारी?
गड़बड़ी तो नींव में है !
इमारत तो गिरना तय है।
नियुक्ति में राजनीतिक पार्टियों का हस्तक्षेप विश्वविद्यालय के
छात्राओं ही नही छात्रों के लिए भी हितकर नहीं !
छात्राओं ही नही छात्रों के लिए भी हितकर नहीं !
"प्रस्तुत विचार
'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय'
में मेरे छात्र जीवन के अनुभव पर आधारित है।"
'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय'
में मेरे छात्र जीवन के अनुभव पर आधारित है।"
सादर अभिवादन
आप सभी का।
आप सभी का।
दे दिया होगा
सूरज को महाशाप
नियमित, अनवरत, बेशर्त
जलते रहने का
दूसरों को उजाला देने का,
कही कविता........आदरणीया ''नूपुरम'' जी
माँ को सदा गृहस्थी के
उलटे - सीधे फंदों में
रहीम के दोहे बुनते देखा।
दाल-भात, खीर और फुल्के
रसखान के रस में पगते देखा।
प्यार का मतलब .....चंचलिका शर्मा
आदरणीय "दिग्विजय अग्रवाल" द्वारा संकलित
तुम कहते हो
मैं जिद्दी हूँ
और थोड़ी सी
हूँ मनचली ...
हाँ , मैं हूँ
स्वीकार है मुझे
मैं जिद्दी हूँ
सड़क पर हादसे आपका इंतज़ार करते है .....
आदरणीय "विक्रम प्रताप सिंह सचान''
घर से निकला करो बहुत दुआयेँ लेकर
सड़क पर हादसे आपका इंतज़ार करते है ।
प्रेम पथ........
आदरणीया डा. ''किरन मिश्रा''
और तुमने हस कर कहा था
बिना संकट के कुछ भी सार्थक की प्रति संभव कहां
संभव तभी है
जब मन के पथ में दूसरे की गंध भरी हो
एक ग़ज़ल : छुपाते ही रहे अकसर---
आदरणीय "आनंद पाठक"
ख़िजाँ का है अगर मौसम ,दिल-ए-नादाँ परेशां क्यूँ
सभी मौसम बदलता है ,बदल जायेगा ये मौसम
फोटोग्राफी : पक्षी 28 (Photography : Bird 28 )
आदरणीय राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"
खड़ी लंबी पूंछ आमतौर पर आयोजित की जाती है और पूंछ के पीछे का रंग शाहबलूत जैसा और शरीर का गहरा रंग, इन्हें काला पिद्दा
(पाइड बुशचैट) और ओरिएंटल मैग्पी रोबिन में से
आसानी से पहचाना जा सकता है।
वैज्ञानिक नाम: कॉप्सिकस फॉलिकेटस
फोटोग्राफर: राकेश कुमार श्रीवास्तव
अब आज्ञा दें
धन्यवाद।
"एकलव्य"







