सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
"सहने की सीमा से शासन शुरू"
बात केवल शासन की कर रही हूँ
मैं स्त्री कभी अपनों ने
कभी परायों ने
कभी अजनबी सायों ने
तंग किया चलती राहों में
बहुत दराज़ फ़साना है ये कुछ रोग होते हैं लाइलाज़
इक ज़ख्म खा के जाना है ये
गीत विरह का उम्र भर ही
हमको बस अब गाना है ये
रूठना मनाना हमको आता है हक से, पर वो मानते नहीं हमसे ||
करो ना गुरूर इतना भी हम से, हम जो चले गए फरियाद करोगे रब से |
आज जो पल मिले जी लो खुशी से , कल ना कहना मिले नहीं हंसी से ||
मनाने रुठने के तजुर्बे हैं ता उम्र से, है यही दुआ ना रुठे जिंदगी ये हमसे |
किसी के इतने पास न जा मुझे धोखेबाज़ मत समझना!!
हमें उस दिन उमैर भाई ने एक साथ देख लिया था!
उन्होंने मुझसे मुलाकात की ,पसंद भी किया !!
मगर वादा ले लिया कि तुम्हे ना बताऊँ !!
मुझे वादे का पास रखना था!
उन्होंने मुझे कोल्ड ड्रिंक में ज़हर दे दिया !
मर रहा हूँ !
शायद तुम्हारे घर में ही गाड़ दिया जाऊँ
तीन दीवारों का कमरा रैन बसेरा वाली रातों का ठिकाना
रातें जो आधी अंजान गलियारों में कटती हैं
और शरणार्थियों की अमर बस्ती
वहशत-ए-दिल का एक ठौर
आवारा अँधेरा और बस एक रोशनी
किरणों के धागे से बुनी दुआ की चादर
जो चढ़ती है शहर पर हर जुम्मे
और सीढ़ी दर सीढ़ी उतरती वो आवाज़
फिर मिलेंगे
विभा रानी श्रीवास्तव