सादर अभिवादन
सफर की तैय्यारी कर रही हूँ..
सो सीधे चलिए रचनाओं की ओर....

प्राकृतिक अभियंता....आशा सक्सेना
तिनके चुन चुन
घरोंदा बनाया
आने जाने के लिए
एक द्वार लगाया
मनोयोग से
घर को सजाया
दरवाजे पर खड़े खड़े
अपना घर निहार रही
सफर की तैय्यारी कर रही हूँ..
सो सीधे चलिए रचनाओं की ओर....

प्राकृतिक अभियंता....आशा सक्सेना
तिनके चुन चुन
घरोंदा बनाया
आने जाने के लिए
एक द्वार लगाया
मनोयोग से
घर को सजाया
दरवाजे पर खड़े खड़े
अपना घर निहार रही

अपने नज़रिये से
जो "प्रेम" लगता है
वह "प्रेम"
हमेशा "प्रेम" नहीं होता
एकांत लम्हों का
सहयात्री होता है !
सहयात्री सुपात्र हो
ज़रूरी नहीं
कुपात्र भी हो सकता है

खामोशियों में भी
दूरियों में भी
कुछ तड़पता है
कुछ कसकता है
वो न हो कही भी
फिर भी
हर साँस के साथ उनको
महसूस करते है

मेरे मसीहा...
मेरे अज़ीज़, मेरे मसीहा
सोचती हूं
तुम्हें किस किस तरह पुकारूं
कितनी प्यारी थीं वो बचपन की बात पुरानी
जब दादी सुनाया करती हमको एक कहानी
बारिश के पानी में हम थे नाव चलाया करते
गुड्डे-गुड़िया की शादी में खूब मजे करते
तब माँ ने किया तकनीकी इस्तेमाल
फेसबुक पर स्टेटस ठेला और मंगवाया लिंकित ज्ञान
अब दोनों बैठे टकटकी लगाए
टिपण्णी ताकते,कि कोई कविता-
कविता में हास्य लेकर आए
तभी मिला ये अद्भुत ज्ञान कि
बात पते की....डॉ. सुशील जोशी
चेहरा चेहरे को
देखता तो है
चेहरे में चेहरा
दिखाई दे जाता है
चेहरे को चेहरा
नजर नहीं आता है
चेहरा अपना
चेहरा देख कर ही
मुस्कुराता है
खुश हो जाता है
दें इज़ाज़त यशोदा को..
बात पते की....डॉ. सुशील जोशी
चेहरा चेहरे को
देखता तो है
चेहरे में चेहरा
दिखाई दे जाता है
चेहरे को चेहरा
नजर नहीं आता है
चेहरा अपना
चेहरा देख कर ही
मुस्कुराता है
खुश हो जाता है
दें इज़ाज़त यशोदा को..


