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बुधवार, 18 जनवरी 2017

551....क्यों खो रहा है चैन अपना पाँच साल के बाद उसके कुँभ के आने में

सादर अभिवादन
रविवार को दहेज उत्पीड़न को न सह कर पाने की वजह से
एक नव-ब्याहता ने आत्मदाह कर लिया
मन खराब था...
होईहै वही जा राम रचि राखा...

आज की परिक्रमा...


पहली बार..
कविता"एक धरा है एक गगन है"...अर्चना सक्सेना
क्यों बना लीं इतनी दीवारें
दिल में भी न झाँक हैं पाते
दर्द भरा है सभी के अंदर
ये भी नहीं जता ही पाते

ये जो पल बिताएं हैं 
हमने साथ मिलके,  
खट्टी मीठी सी यादें 
बनकर रह जाएंगे !
बस कुछ यादों में सिमट जाएंगे 

निरुद्वेग है
विराम की प्रतीक्षा
आया विमान
जिया जीवन
अब तो करना है
महा प्रस्थान

जीना चाहती थी मैं भी कभी इन तरंगों की तरह,
सुनना चाहती थी कभी मैं भी इन की मधुरता को:

महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,

उसे 
पता है 
चूहा 
रख कर 
खोदा जायेगा 
पहाड़ इस 
बार भी 
निकलेगा 
भी वही 

आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलेंगे





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