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सोमवार, 21 नवंबर 2016

493.........क्या किया जाये जब देर से समझ में आये

सादर अभिवादन
होनी तो हो कर रहती है
आज ऑफिस से घर लौटते वक्त
किसी अनजान गाड़ी वाले ने अपना अगला चक्का
इनके पैर पर दे मारा.. चोट तो नहीं आई पर
सूजन आ गई है...वे समझदार थे एक्सरे करवाते हुए घर आए
कल की रिपोर्ट पर पता चलेगा कि घर पर बैठना है या ऑफिस जाना है

आज की पसंदीदा रचनाएँ....


बच्चे बगीचे में खेल रहे थे ,कोई दौड़ रहा था , कोई रस्सी कूद रहा था ।
 मैं बेंच पर बैठकर उन्हें देख रह थी ।कितने निष्फिक्र थे सभी , अचानक एक बच्ची मेरे पास आकर बोली ,
"आंटी , देखो न , हमारी रस्सी में गाँठ पड़ गई है क्या आप इसे खोल देगीं ।" 
मैंने कहा ,क्यों नहीं ,देखो अभी खोल देती हूँ .
इतना कह मैंने रस्सी हाथ में ली देखा अभी तो गाँठ ढीली है ,झट से खोल कर उसे दे दी । 
बच्ची खुश होते हुए धन्यवाद बोलकर फिर खेलने में मगन ।


आजकल देश में जो एक ही मुद्दा छाया हुआ है उस पर तरह-तरह की बेबुनियाद, फिजूल, भ्रामक, 
भड़काऊ खबरें रोज ही उछाली जा रही हैं। ऐसा नहीं है कि लोग परेशान नहीं हैं, 
उन्हें दिक्कत नहीं हो रही पर उनकी सहनशीलता उन्हें साधुवाद का पात्र बनाती है। 
दूसरी ओर मीडिया रुपी मौलवी शहर के अंदेशे से दुबला होते जा रहा है।



ना हो तो
नुक्स बेचारा दर्पण झेलता है
सोच परिपक्वता मांगती है
आइना तो वही दर्शाता है
जो देखता है


बचपन, मदमस्त बचपन। ना चिन्ता ,न फ़िक्र,ना किसी का भय , अपनी ही दुनियाँ में मस्त ।
ईर्ष्या -द्वेष से परे जिन्दगी जहाँ जीने के लिए जिये जाती है,  जहाँ उसे उसे बचपन कहते हैं ।
बचपन में मानव के अंधो पर जिम्मेदारी का कोई बोझ नहीं होता ,कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती ।


जलती-बुझती-सी रोशनी के परे
हमने एक रात ऐसे पाई थी


उजला काला हो गया, बंद हुआ जब नोट. 
झटके में जाहिर हुआ, सबके मन का खोट.. 
चलते-चलते रुक गया, अचल हुआ धन खान. 
हाय! अचल धन पर गड़ा, मोदी जी का ध्यान..



आज का शीर्षक...
जब देर से 
समझ में आये 
खिड़कियाँ 
सामने वाले की 
जिनमें घुस घुस 
कर देखने समझने 
का भ्रम पालता 
रहा हो कोई 
खिड़कियाँ 
थी ही नहीं 
आईने थे 
......

आज्ञा दें चलती हूँ
सादर
यशोदा












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