सादर अभिवादन
रक्षाबंधन बीता है बस कल परसों
फिर स्वागत करिएगा कृष्ण जन्माष्टमी, हल छठ, पोरा,
हरतालिका तीज, और गणेश चतुर्थी
और न जाने क्या क्या
कल भाई रवींद्र जी आएंगे, लघुकथा का अंक लेकर
पसंदीदा रचनाएं
पेड़ खड़े हैं क़तार में,
किसी के इंतज़ार में,
न जाने कब आ जाए इस ओर
कोई अजनबी मुसाफ़िर।
जिस घर में लड़की अपनी
स्वाभाविक भाषा भी न बोल सके
स्वाभाविक भाषा भी न बोल सके
वहाँ दीवारें भले साफ़ हों
हवा सड़ी हुई होती है
और जिस आदमी के सामने
लड़की बिना डर के
अपनी सबसे गंदी भाषा बोल सके
उसी के सामने
वह अपने सबसे मानवीय रूप में होती है
सूखे में कहीं बाढ़ में फसलें थी धान की
फिर भी अमीन लाये हैं नोटिस लगान की
पत्रा में लग्न खूब थे पंडित भी कम न थे
फिर भी कुँवारी रह गयी बेटी किसान की
कल मस्त थे जिसके दल में
करने में गुणगान रे
पलभर में छोड़ चले सब
बेच दिया ईमान रे
आओ - आओ, देर न करना
दल ,बदल के काम में
“बधाई हो, आपका घोड़ा बच गया।
अब इसे नहीं मरना पड़ेगा।”
यह खबर सुन पठान बहुत खुश हुआ
और तुरंत बोला....
“डॉक्टर साहब आज खुश कर दिया आपने।
मैं आज बहुत खुश हूँ और इसी ख़ुशी में
“आज बकरा कटेगा”!
सादर समर्पित
वंदन