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रविवार, 23 अगस्त 2026

4843...आया सावन, सुन कर पुकार, धरा मुस्काई ...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक की चुनिंदा पाँच रचनाएँ-

(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो स्तरीय एवं पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

******************   

 हाइकु मुक्तक - सावन

आया सावन, सुन कर पुकार, धरा मुस्काई 

फूल ही फूल, चूनर में अपनी, टाँक ले आई 

बरसी बूँदें, गरजे घन घटा, तड़पे जिया

हर्षित धरा, लहरा के आँचल, ले अँगड़ाई !

*****

तेरी यादों से ओझल हो गया तो

बहाते हो जो भर-भर अश्क़ छुप कर,
ये रेगिस्तान जंगल हो गया तो.

रहेगा काम क्या लोगों पे बाक़ी,
धरम का मसअला हल हो गया तो.

*****

865. इंतज़ार

बनाने लगती है 

अपने बेटे के लिए 

बेसन के लड्डू,

उसकी पसंद की सब्ज़ी,

झाड़ने लगती है

उसका साफ़-सुथरा बिस्तर। 

*****

ऋतुएं

सूखे आषाढ़ के बाद सावन का हरा होना

केवल कल्पना है 

किसान बोएगा फिर भी धान 

इस उम्मीद में कि भादो जरूर बरसेगा

और भादो है कि

कई सालों से या तो खूब बरसा है

या एकदम ही नहीं 

*****

वास बन आ जा प्रिये

तराश तेरी तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे 

प्रायः कर लेती दीदार तूलिका के इमदाद से ,

समीर के झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये

तुझे मिल जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के ।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


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