शीर्षक पंक्ति:आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
छाये हैँ परमाणु के बादल,
आज दहशत में मानवता।
किस क्षण टकरायें बादल,
अरु हो जाये घनघोर वर्षा।।
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पानी के घूंट हलक से उतारती है,
उठकर खिड़की तक जाती है,
चुपके से गली में झाँकती है,
सब कुछ ठीक पाती है लड़की।
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जनश्रुति के कोहरे में घिरा, माडूं का नीलकंठ मंदिर (वीडियो सहित)
इस मंदिर के गर्भ-गृह में स्थित शिवलिंग का एक प्राकृतिक झरने से सतत जलाभिषेक होता रहता है, जो मंदिर को खास बनाता है। अब हिंदुओं का कोई खास धर्म स्थान हो और विधर्मियों की कुदृष्टि उस पर ना पड़े, यह तो हो ही नहीं सकता, सो यहां भी वही सब दोहराया गया जो पहले से होता आया है ! साथ ही हमारे तथाकथित इतिहासकारों ने अपने कुठिंत विचारों से इसके बारे में भी सदा की तरह एक मनघड़ंत कहानी गढ़ी और फैला रखी है ! उसीको यहां के स्थानीय निवासी और गाइड वगैरह आने वाले पर्यटकों-श्रद्धालुओं को सुनाते-बताते रहते हैं !*****1499-जल-दिवस
6झील है सोई
कविमन खोजता
रूपक कोई।
7
खिली है धूप
स्वर्णमयी हो रहा
झील का रूप।
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