सादर अभिवादन
समय एक खुली किताब है,
जिसके पन्ने हवा में उड़ते हैं,
कुछ शब्द धुंधले हो जाते हैं,
कुछ अक्षर दिल में जुड़ते हैं।
हर पन्ना एक कहानी है,
हर कहानी में एक मोड़ है,
कहीं हँसी की धूप खिली है,
कहीं आँसुओं का भी शोर है।
रचनाएं देखें
वे जानते हैं—
जिस दिन वह सचमुच 'मनुष्य' हो गया,
उनके गढ़े हुए पत्थर के 'देवता' नंगे हो जाएँगे...
और उनकी सदियों पुरानी 'सत्ता'—
महज़ एक कोरी अफ़वाह बनकर रह जाएगी!
तिरी एक ही नज़र से मेरा दिल मचल न जाये,
कि पिघल के मोम जैसा ये वजूद ढल न जाये ।
मिरी आँख का सितारा तिरी राह देखता है,
कोई अश्क बन के पलकों से यूँ ही फिसल न जाये।
तिरी याद का चराग़ाँ मिरी रूह में सजा है,
जो थिरक रही है लौ ये कहीं बुझ के जल न जाये।
शुरुआत होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे। आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे...............
ऐसे हुआ संपन्न होलिका दहन
कुटिलता के अभेद्य अस्त्र-शस्त्र
सरलता के तेज से जाते पिघल
अंततः वरदान भी होता विफल
सादर समर्पित
सादर वंदन
