सादर अभिवादन
हवा
माहौल गर हो
हवा को मिलता है मौका
राहत देने का हमें गर्मी में
बनकर सुहावना झोंका
बंदिशे लगी तो इनपर
आती है सब पर शामत
तूफ़ान बन कर लाती है
हम पर ये आफत
तेवरों में जब इसके
आती है कुछ नमी
सर्दी की ठिठुराहट में
पाते है हम कमी
बड़े बड़े अडिग सूरमा भी
अब हवा के रुख को तकते है
जिधर को ये चल पड़ी
उसी ओर खुद भी बहते है
-अपनत्व से
और भी है... क्रमशः आएगी ही
एक साधू धनुष हो जाता है
एक साधू अर्जुन हो जाता है
एक साधू मछली की आंख हो जाता है
साधू साधू है
सभी साधुओं के लिए
‘उलूक’ को गर्व है
कलयुगी ऐसे सारे साधुओं में
उसे नागा बाबा होना
साधू साधू से अच्छा होता है
स्वाहा देवी का ध्यान इस प्रकार है:-- हे देवी स्वाहा! आप मंत्रों से परिपूर्ण हैं; आप मंत्रों की सिद्धि हैं; आप स्वयं सिद्धा हैं; आप मनुष्यों को सिद्धि और कर्मफल प्रदान करती हैं; आप सबका कल्याण करती हैं। इस प्रकार ध्यान करते हुए, मूल मंत्र का उच्चारण करते हुए पाद्य (पैर धोने का जल) आदि अर्पित करना चाहिए; तब उसे सिद्धि प्राप्त होती है। अब मूल बीज मंत्र के बारे में सुनो। उक्त मंत्र (मूल मंत्र) यह है:-- "ॐ ह्रीं श्रीं वह्निजयायै देव्यै स्वाहा।" यदि इस मंत्र से देवी की पूजा की जाए, तो सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
तुम्हारे साथ का मतलब ये समझ पाया हूँ,
हसीन मोड़ भी मंज़िल का पता होता है.
उसे यक़ीन है गंगा में धुलेंगे सारे,
गुनाह कर के वो हर बार गया होता है.
रिमझिम पड़े फुहार, हवा चलती मतवाली ।
खिलने लगते फूल, महकती डाली डाली ।
आई है बरसात, घुमड़कर बादल आते ।
गिरि कानन में घूम, घूमकर जल बरसाते ।।
उस दिन छोटे मामा जी के देहांत पर जब देवबंद पहुँचा तो मेरे भीतर का बच्चा अपने जाने-पहचाने spots को ढूँढ रहा था। आस-पास सबने अपने घर तुड़वाकर नए तरीके से बनवा लिए थे। ननिहाल के घर की थोड़ी मरम्मत ज़रूर हुई थी, लेकिन वो अब भी पुरानी यादों जैसा ही था। बाहर के गुलाबी रंग की qualityबेहतर हो गई थी, जिसका मुझे अफ़सोस था,क्योंकि मेरे मन में तो वही पुराना गुलाबी-नारंगी रंग देखने की इच्छा थी। पहले के बने झरोखे,न जाने paint के कितने coats से ढक गए थे, और मजबूत दरवाजे अब भी वही थे।.....
आज बस
सादर वंदन




