सादर अभिवादन
श्रावण भी न जा भी नहीं रहा
और रुक ने की इच्छा भी नहीं न कर रहा
श्रावण के महीने का यहाँ उल्लेख, जो आमतौर पर भगवान शिव की पूजा के लिए जाना जाता है, यह सुझाव दे सकता है कि यह स्थिति धार्मिक या आध्यात्मिक संदर्भ में भी हो सकती है। हो सकता है कि आप किसी धार्मिक या आध्यात्मिक यात्रा पर हों और यह न जानते हों कि आगे क्या करना है, या आप किसी आध्यात्मिक सत्य को समझने की कोशिश कर रहे हों और यह न जानते हों कि क्या मानना है।
और भी है... क्रमशः आएगी ही
जो ‘है’
वह कहने में नहीं आता
जो ‘नहीं है’
वह दिल में नहीं समाता
जो ‘होकर’ भी ‘न हो’ जाये
जो ‘न होकर’ भी दिल को लुभाये
अस्तित्व विहीन
झुंड अक्सर
ऐसे ही सधता है
जैसे साधने से
एक भेड़
सध जाती हैं
सारी भेड़ें।
हम फ़लाना या ढिकाना
हर ठिकाना छोड़ देंगें
शर्त है, पर,
तुम अमिट विश्वास बन कर
रक्त में अविरल बहोगे
जाने कैसे सावन में मेरा ये मन बँट जाता है !
‘पी’ घर ‘बाबुल’, ‘बाबुल’ के घर ‘साजन’ क्यों तरसाता है
बैठी हूँ बाबुल के अँगना झूल रही हूँ झूले पे
पर कजरी का हर मुखड़ा प्रियतम की याद दिलाता है !
भूल जाएगा ज़माना दादरा, ठुमरी, ग़ज़ल
अब नई पीठी को शापिंग माल ही भाने लगे
जिंदगी भी दौड़ती ट्रेनों सी ही मशरूफ़ है
आप मुद्द्त बाद आए और अभी जाने लगे
हम विशिष्ट नहीं बन पाते ,
क्योंकि हम नहीं स्वीकारते
गलती, दुख, प्रेम और न जाने क्या - क्या ।।
किताबें वही पढ़ते हैं,
जिनका पृष्ठ आकर्षक लगे।
एक उम्र गुजरने के बाद
कोई खास काम नहीं ,
नौकरी भी पूरी हुई
अब कोई रुटीन नही
बस ,सन्नाटा -सा रहता है
सोचती हूँ ,कौन हूँ मैं
घर बनाया ,बगीचा बनाया
और खुद को चारदिवारी में खो दिया
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पहली नज़र में
दोस्ती सच्ची हो
तो वक़्त रुक जाता है,
प्यार का आसमान
लाख ऊँचा हो
मगर झुक जाता है,
हमारी दोस्ती में
दुनिया लाख बने
दीवार रुकावट की,
अगर दिलों का मेल
गहरा हो तो
खुदा झुक जाता है..!
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आज बस
सादर वंदन




