सादर अभिवादन
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शनिवार, 2 अगस्त 2025
4468 ...कोई जिन्दा मिले , तो बताऊं न
गुरुवार, 24 अप्रैल 2025
4468...भूलो नहीं कि यह धूल ही है, जिससे आख़िर में तुम्हें मिलना है...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
शोक और आक्रोश के माहौल में डूबा देश पहलगाम कश्मीर में हुए नरसंहार को लेकर
क्षुब्ध है। आरोप-प्रत्यारोप के दौर में सरकार व सैन्य बलों को समय मिलना चाहिए
कारगर रणनीति बनाने का ताकि ऐसे दुर्दांत दरिंदों को कड़ा सबक़ सिखाया जा सके जो
मानवता और शांति के शत्रु हैं।
महसूस करो उसका स्पर्श,
आदत डाल लो उसकी,
भूलो नहीं
कि यह धूल ही है,
जिससे आख़िर में
तुम्हें मिलना है।
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इन्ही
किताबों पर है दारोमदार
विद्या के
सम्यक बीजारोपण का।
मेधा और
विवेक के सिंचन का।
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वह दिन में नहीं सोता —
इस डर से नहीं कि रात को उठने पर
कहीं वह रात को
‘रात’ के रूप में पहचान न पाया तो,
बल्कि इसलिए
कि वह
दिन को ‘दिन’
के रूप में पहचानता है,
और स्वयं को पुकारता है
टूटती पहचान की अंतिम दीवार की तरह।
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“मेरी नानी की माँ एक बोली की ज्ञाता थीं! उस
बोली को संरक्षित नहीं किए जाने से उनके साथ उनकी बोली लुप्त हो गई…! एक दिन ऐसा न हो कि धरती से पानी भी लुप्त हो
जाये. . .! और जलरोधक पात्र में जल भरकर जमीन में दबाना पड़ जाए. . .!”
“नहीं! नहीं! ऐसा नहीं होगा बड़े मामा. . .!
आप ही तो अक्सर कहते हैं,
‘जब जागो तभी सवेरा’! कोशिश करते हैं अभी से जागने-जगाने हेतु. .
.!”
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