सादर अभिवादन
आंबेडकर जयंती या भीम जयंती, डाॅ. भीमराव आंबेडकर जिन्हें डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म दिन 14 अप्रैल को पर्व के रूप में भारत समेत पूरे विश्व में मनाया जाता है।(विशेष रूप से भारत तथा सम्पूर्ण विश्व केअम्बेडकरवादी बौद्धों द्वारा) इस दिन को 'समानता दिवस' और 'ज्ञान दिवस' के रूप में भी मनाया जाता है, क्योंंकि जीवन भर समानता के लिए संघर्ष करने वाले आंबेडकर को समानता और ज्ञान के प्रतीक माना जाता है।आंबेडकर को विश्व भर में उनके मानवाधिकार आंदोलन संविधान निर्माता और उनकी प्रकांड विद्वता के लिए जाने जाते हैं और यह दिवस उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। आंबेडकर की पहली जयंती सदाशिव रणपिसे इन्होंने 14 अप्रैल 1928 में पुणे नगर में मनाई थी। रणपिसे आंबेडकर के अनुयायी थे। उन्होंने आंबेडकर जयंती की प्रथा शुरू की और भीम जयंती के अवसरों पर बाबासाहेब की प्रतिमा हाथी के अंबारी में रखकर रथ से, ऊँट के ऊपर कई मिरवणुक निकाली थी।
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जो झुककर पाया हमने
वह सुकूं कहाँ मिल सकता,
मूल तुझी से है जिस
वह फूल कहाँ खिल सकता !
गमगीन हो गए तो खुशी के नहीं हुए
वो आसमान है जो ज़मीं के नहीं हुए
इक तुम हमारे बाद ज़माने के हो गए
इक हम तुम्हारे बाद किसी के नहीं हुए
का ज्वार उतरते ही, अंदर महल की
दुनिया ढूँढती है चांदनी रात में
गुमशुदा सुकूँ का ठिकाना,
उठ जाती है तारों की
महफ़िल भी शेष
पहर, बुझ
जाते
हैं सभी चिराग़ अंधकार के पिघलते ही,
उत्सव का कोलाहल थम जाता है
भूल गए
गलियाँ, चौबारे
चिलम फूंकते गाँव, ओसारे,
खुली खाट पर
नील गगन में
गिनते उल्का, चाँद -सितारे,
माँ की पूजा
की डलिया में
गुड़हल चुनना भूल गए.
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फिर मिलते हैं
वंदन



