सादर अभिवादन
आज रविवार को को एक अनुरोध किया था
की आज की पसंदीदा रचनाएं दें
पर अफसोस वे देख नहीं पाई
खैर कल देखेंगे
रचनाएं देखें
इस बार होली में
ऐसी जले होलिका,
अग्नि में भस्म हो जाए !
दुराचार, दुर्भावना,
छल, प्रपंच मिथ्या,
जड़ता,कायरता।
मध्य रात्रि, निस्तब्ध सारा शहर,
बिखरे पड़े हैं प्राचीर के
पुरातन पत्थर,
बाह्य परत
पर बूंद
बूंद
ओस कण, गहन अंतरतम में तुम
बांध चुके हो स्थायी घर, मध्य
रात्रि, निस्तब्ध सारा
शहर ।
एक सुर्ख़ गुलाब देकर
कर देते हैं लोग अपनी
भावनाओं का इज़हार।
यदि यही है
अपने प्रीत को बयां करना तो
कई बार बांधे मैंने ख़ुद ही
अपने जुड़े में
सुर्ख़ गुलाब |
“ख़याल” अब खाइयाँ है नफ़रतों की
कि पुल जो जोड़ते थे वो कहाँ है
-सतपाल ख़याल
आज बस
सादर वंदन


