सादर अभिवादन
जब एक मंत्री जी के दफ्तर के बाहर बैठे 'चपरासी सर'' से पूछा गया कि
भाई आप भीतर भेजने के लिये धन की आशा क्यों रखते हैं।
'चपरासी सर' ने दार्शनिक अंदाज़ में बताया कि उन्हें यह सुविधा हनुमान चालीसा में दी गयी है।
पूछने वाला चकित... पूछ ही बैठा कि बताओ भाई संत तुलसीदास आपके लिये यह प्रबंध कब कर गये।
'चपरासी सर' ने कहा - आपको याद है कि स्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा में कहा है..
'राम दुआरे तुम रखवारे,
होत न आज्ञा बिनु पैसा रे'
यानी कि हनुमान जी की मर्ज़ी के बिना प्रभु राम के दर्शन नहीं हो सकते, ठीक वैसे ही...
अब रचनाएँ पढ़िए
कब सफर पूरा हुआ है ज़िंदगी का हार कर ।
मंजिलों की शर्त है बस मुश्किलों को पार कर।।
मुश्किलों के दौर में बस हार कर मत बैठना
आसमां को नाप लेंगे आज ये इकरार कर ।।
फूलों पे तितलियाँ हों बहारें हों चमन में
महफ़िल में ग़ज़ल -गीत का दीवान नया हो
बेटी हो या बेटा रहे रस्ते में सुरक्षित
इस अबोहवा में यही एहसान नया हो
‘कन्यादान के लिए कन्या के माता-पिता आगे आएं !’
तभी शादी के नेगों में साले-सलहज द्वारा बहुत सस्ते में टरका दिए जाने से ख़फ़ा और बेहद सुलगे हुए मधुकर पांडे के फूफाजी ने पंडित जी को टोकते हुए कहा –
‘पंडित जी, इस विवाह में कन्यादान नहीं होगा.
हमारे समधी साहब और समधी साहिबा ने अपने लिए जमाई और हमारी बहूरानी ने अपने लिए वर खरीदा है फिर काहे को उनसे कन्यादान की रस्म करवाई जाए?
आप तो हमारे साले साहब से और हमारी सल्हज साहिबा से पुत्र-विक्रय की रस्म करवाइए.’
क़ायदे से तो अपनी जग-हंसाई पर और जग-थुकाई पर, सुदामा पांडे मास्साब को चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए था लेकिन तीन लोक का राज मिल जाने की ख़ुशी में, अपनी खींसें निपोरते हुए, वो बेशर्मी से, अपने ऊपर ठहाका लगाने वालों का खुल कर साथ दे रहे थे.
ज़रा और भी खुलते, दूर तक बहते बहते कहीं
किसी मोड़ पर दो स्रोत अंदर तक एक दूजे
से मुक्कमल जा मिलते, कुछ देर काश
और ठहरते । प्रकाश स्तम्भ और
लहरों के मध्य एक मौन संधि
ज़रूरी है,
चलते - चलते
*****
बस

