सादर नमस्कार
आज भाई दूज है
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बचपन में एक कहानी पढ़ी थी, जिसका सार था कि दिवाली की रात घूमते हुए माँ लक्ष्मी को एक गरीब ब्राह्मण की कुटिया दिखाई पड़ी, जिसमें एक छोटा सा दीपक जल रहा था और ब्राह्मण दंपत्ति अधपेट खा कर भी प्रभु का आभार मान रहे थे ! उनको देख माँ का हृदय पसीज गया और उन्होंने उनके शेष जीवन को सुखमय बना दिया !
शउर बता कर गुज़रता अबके वरस
रिश्तों के गिरहें को सुलझाता अबके वरस
मेरी उम्र की तरुणाई को ले चला ये
कुछ जिंदगी में विश्वास जताता अबके वरस
यूँ बुलाया तो था उसने ..
फोन कर, बड़े ही प्यार से,
व्यंजन भी तो फिर ..
परोसे उसने अनेक प्रकार के।
पर पास बैठे, करे बातें
कुछ देर, हम रहे इंतज़ार में,
चलते वक्त मिले खाने के
सौग़ात भी तो अख़बार में।
त्योहारों की सुबह कैसा कच्चा-कच्चा सा मन होता है।
मैंने सपने में दोस्त को देखा। कई समंदर पार से वह देश आया हुआ है। मैंने दौड़ते हुए उसके पास जाती हूँ और उसे हग करते ही पिघल जाती हूँ। मोम। थोड़ी गर्मी और नरमाहट लिये हुए। यह मेरी जानी हुई जगह है। मैं यहाँ सुरक्षित हूँ। सेफ़। मैं यहां खुश हूँ। मेरा मन मीठा है। यहाँ से कहीं जाने की हड़बड़ी नहीं है। सपने की जगह पहचानी हुई नहीं है। लेकिन जाग में वो शहर मेरा अपना लगता है। मैं पूछती हूँ उससे, ‘तुम क्यों आए अभी?’, वो कहता है, ‘तुम्हारे लिए, पागल, और किसके लिये। मुझे लगा तुमको मेरी ज़रूरत है।’
जहा दिव्य हैं ज्ञान नहीं
रहा वहां अभिमान
दीपक गुणगान करो
करो दिव्यता पान
उजियारे का दान करो
दीपक बन अभियान
दीपो से हैं दिव्य घड़ी
रहे दिव्य मुस्कान
अखबार का पिछली पन्ना
छोड़ता कोई किसी को है डाँट कोई और खाता है
इस देश में होने लगा है बहुत कुछ अजीब गरीब
किसी की करनी का फल किसी और की झोली में चला जाता है
बस





