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मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

4084 ...वह छोटी गरबीली चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूं

 


सादर अभिवादन

वह चिड़िया जो-
चोंच मार कर
दूध-भरे जुंडी के दाने
रुचि से, रस से खा लेती है
वह छोटी संतोषी चिड़िया
नीले पंखों वाली मैं हूं
मुझे अन्न से बहुत प्यार है।

वह चिड़िया जो -
कंठ खोल कर
बूढ़े वन-बाबा के ख़ातिर
रस उंडेल कर गा लेती है
वह छोटी मुंह बोली चिड़िया
नीले पंखों वाली मैं हूं
मुझे विजन से बहुत प्यार है।

वह चिड़िया जो-
चोंच मार कर
चढ़ी नदी का दिल टटोल कर
जल का मोती ले जाती है
वह छोटी गरबीली चिड़िया
नीले पंखों वाली मैं हूं
मुझे नदी से बहुत प्यार है।
- केदारनाथ अग्रवाल

आइए देखें कुछ रचनाएं ....



सफलता की ऊँचाई पर खड़ा
वक़्त का है अंत यहाँ पर
सेवा समाप्ति तो बस एक पड़ाव है
काम की संतुष्टि तो है दिल के अंदर
जो मैं कभी निभा नहीं पाऊँगा
ऐसा वादा नहीं करूँगा


जात भी है, धर्म भी है, पंथ भी !
हर तरह के देश में हैं ग्रंथ भी,
क्यूँ मगर इनके लिए लड़ते हैं हम,
बात पर अपनी ही क्यूँ अड़ते हैं हम ?
तुम लिखो एक प्रेम की पुस्तक नई,
इंसान की तुम जीत लिख दो साथियो !





फूलों पर रंगों का पहरा,
खुशबू भी लुभा रही भंवरा,
बैठा था मैं कुछ ऐसी  जगह
जहां  मिलने आती थी शीतल  हवा ।





तेज़ धूप में फिर आज ये बारिश क्यो हैं...
नम पलकों के दरवाजे पर,
किसी ख़्वाब की गुजारिश क्यो है..
कई रोज़ बाद दिखा ये घना कोहरा,
रात के ही आग़ोश में खो गया सवेरा,





स्मृतियों का पाथेय प्रतीक्षा को
प्रेम के गहरे रंग में रंग देता है
तुम प्रमाण मत देना
क्योंकि जितनी झाँकती है प्रीत
किवाड़ों और खिड़कियों से
उतनी ही तो नहीं होती
मौन ने भी लिखे हैं कई गीत




ढूंढती रहती आंखें खोए हुवे लम्हों को
हकीकत के चश्में अपनों के चेहरों को
काश फ़साना  बनती न जिन्दगी यूं.....
मौत भी आसान लगती जिन्दगी को।।



आज बस. ...
अगले सप्ताह सखी आएंगी
सादर वंदन
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