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शनिवार, 26 अगस्त 2023

3861... मीरास

मीरास : अरबी [संज्ञा स्त्रीलिंग] शब्द; जिसका अर्थ बपौती, वह धन संपत्ति जो किसी के मरने पर उसके उत्तराधिकारी को मिले वंश-परंपरा के गुजारे के लिए.... प्रयोग के आधार पर ये शब्द भिन्न-भिन्न अर्थ प्रकट कर सकते हैं....

निंदोपाख्यान

"राग दरबारी साध रहे हो या भांड दरबारी हो रखा है•••!"

'साहबे मीरास' थे पहले कभी,

आजकल 'भांड' होते जा रहे हैं।

 हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो... 

बपौती

नैन साहब - पहले तमाम अखबारों में चित्रों के लिए भरपूर जगह रहती थी लेकिन अब अखबारों में वैसे चित्र नहीं छपते। चित्रों को अधिकाधिक स्थान देने वाली तमाम पत्रिकाएँ कभी की बंद हो गई। मोबाइल में कैमरे आने के बाद कला छायांकन का काम संकट में पड़ गया है। मोबाइल फोटोग्राफी के अनियंत्रित विस्तार ने उत्कृष्ट एवं कलात्मक छायांकन को एक बारगी ही हाशिये पर धकेल दिया है। अब कला मिशन न होकर व्यवसाय बन गई है किंतु मेरी दृष्टि में कला व्यवसाय की वस्तु नहीं है। दरअसल यह हमारी सांस्कृतिक आवश्यकताओं और आत्मिक सुख के लिए है।

मीरास

वे तल्ख लहजे में कहती हैं कि अगर भाई उनसे रिश्ता खत्म करना चाहते हैं, बेशक खत्म कर लें. ऐसे भाई किस काम के, जो अपनी बहनों का हक छीनकर चैन-सुकून की जिन्दगी बसर करते हैं. बहनों को तिहाई देने के मसले पर इनके भाइयों का कहना है कि वालिद की मौत के बाद उन्होंने अपनी बहनों की शादी की है. इसलिए अब तिहाई देने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. इन चार बहनों जैसी न जाने कितनी ही बहन-बेटियां हैं, जिन्हें उनके हक से महरूम रखा गया है.

मीरास

इतिहासविद् डॉ. रहीस सिंह अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत में लिखते हैं कि “मध्यकालीन दक्कन की मीरासी व्यवस्था भूमि-व्यवस्था में सबसे प्रमुख और प्रथम श्रेणी की थी । यह कृषक स्वामित्व की व्यवस्था थी । भू-व्यवस्था के तहत मीरास का तात्पर्य उस भूमि से है जिस पर व्यक्ति का एकछत्र पुश्तैनी अदिका हो । मराठी दस्तावेजों में इसका प्रयोग ऐसे किसी पुश्तैनी और हस्तान्तरित अधिकार के लिए किया गया है जिसे व्यक्ति ने उत्तराधिकार में खरीदकर या उपहार द्वारा प्राप्त किया हो।”

मीरास

इस लिए मृतक की बेटी मृतक की माँ की तुलना में उसकी विरासत में अधिक भाग पाती है हालांकि दोनों ही स्त्री हैं। इसी तरह मृतक की बेटी मृतक के बाप की तुलना में अधिक हिस्सा पाएगी भले ही लड़की अभी इतनी छोटी हो कि दूध पीती है और अपने बाप को भी पहचानने की आयु को न पहुंची हो यहाँ तक कि अगर मृतक के धनदौलत बनाने में उसके बाप की सहायता भी शामिल रही हो तब भी मृतक के बाप को मृतक की बेटी की तुलना में कम भाग ही मिलेगा। केवल यही नहीं बल्कि उस समय अकेले बेटी आधा धन लेगी।

मीरास

इस बेना पर ज़्यादा तर मरहलों में मर्द ख़र्च करने वाला और औरत इख़राजात लेने वाली होती है, इसी वजह से इस्लाम ने मर्द मर्द के हिस्से को औरत की ब निस्बत दो गुना क़रार दिया है ता कि तआदुल बर क़रार रहे और अगर औरत की मीरास, मर्द की मीरास से आधी हो तो यह ऐने अदालत है और इस मक़ाम पर मुसावी होना मर्द के ह़ुक़ूक़ पर ज़ुल्म हैं। इसी बेना पर हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम ने फ़रमाया:माँ बाप और औलाद के इख़राजात मर्द पर वाजिब हैं।

मीरास



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पुनः भेंट होगी...
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शनिवार, 22 जुलाई 2023

3826... क्या कहूँ....

देखो हमें

हम मांस के थरथराते झंडे हैं

देखो बीच चौराहे पर बरहना हैं हमारी वही छातियाँ

जिनके बीच

तिरंगा गाड़ देना चाहते थे तुम

देखो सरेराह उघडी हुई

ये वही जांघे हैं

जिन पर संगीनों से 

अपनी मर्दानगी का राष्ट्रगीत

लिखते आए हो तुम

हम निकल आयें हैं

यूं ही सड़क पर

जैसे बूटों से कुचली हुई

मणिपुर की क्षुब्ध लरजती धरती

अपने राष्ट्र से कहो घूरे हमें

अपनी राजनीति से कहो हमारा बलात्कार करे

अपनी सभ्यता से कहो

हमारा सिर कुचल कर जंगल में फैंक दे हमें

अपनी फौज से कहो

हमारी छोटी उंगलियाँ काटकर

स्टार की जगह लगाले वर्दी पर

हम नंगी निकल आयीं हैं सड़क पर

अपने सवालों की तरह नंगी

हम नंगी निकल आयीं हैं सड़क पर

जैसे कड़कती है बिजली आसमान में

बिल्कुल नंगी.......

हम मांस के थरथराते झंडे हैं @ अंशु मालवीय

21 जुलाई 2023

5 जून 2023 की गोष्ठी... 

हाज़िर हूँ...! पुनः 
उपस्थिति दर्ज हो...
   

बाँका में जन्मे और वर्तमान में पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के अध्यापक के रूप में कार्यरत डॉ. चन्दन सिंह की 'पाँच स्त्रियाँ दुनिया की असंख्य स्त्रियाँ हैं' नामक कविता सोशल मीडिया पर ख़ूब चर्चित हो रही है। मणिपुर की हालिया घटनाओं के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता अचानक और अधिक महसूस की जाने लगी है। महिलाओं के प्रति इस प्रकार की कोई भी हिंसा इस कविता को बारंबार प्रासंगिक बनाती रहेगी। 'बारिश के पिंजड़े में' कविता-संग्रह में संकलित यह कविता आप भी पढ़िए और विचार करिए – 

खेतों में उग रही है कपास 

प्रजननरत हैं रेशम के कीड़े 

भेड़ 

नाई के यहाँ जा रही हैं 

घूम रहा है चरख़ा 

चल रहा है करघा 

ख़ूब काते जा रहे हैं सूत 

ख़ूब बुने जा रहे हैं कपड़े 

ऐन इसी समय 

पाँच स्त्रियों को नंगा किया जा रहा है 

गाँव के बीचों-बीच 

भरी भीड़ में 

एक-एक कर नोचे जा रहे हैं सारे कपड़े 

देह से अंतिम कपड़ों के नुचते ही 

उनकी बाँहें और टाँगें 

आपस में सूत की तरह गुँथकर बन जाना चाहती हैं 

ख़ूब गझिन कपड़े का कोई टुकड़ा 

गालियाँ बकती हुई बंद करती हैं वे अपनी आँखें 

तो पलकें चाहती हैं मूँद लेना पूरा शरीर 

आत्मा चाहती है बन जाना देह की चदरिया 

पाँच स्त्रियों को बहुत चुभता है 

दिन का अश्लील प्रकाश 

भीड़ में कोई नहीं सोचता कि अब 

फूँककर बुझा देना चाहिए सूर्य! 

पाँच स्त्रियों को चलाया जाता है 

यहाँ से वहाँ तक 

वहाँ से वापिस नहीं लौटना चाहती हैं वे 

मुड़ जाना 

किसी पथरीले और जंगली समय की ओर 

जब तन ढँकने का रिवाज नहीं था 

अधिक से अधिक 

देह की चमड़ी भर उतारी जा सकती थी 

शर्म से लहूलुहान पाँच स्त्रियाँ 

देह पर लाज भर लत्ता नहीं 

धीरे-धीरे सारी लाज 

सहमी हुई जा दुबकती है नाख़ूनों की ओट में 

बची हुई मैल के बीच 

जब पहली बार पृथ्वी पर 

कपास को दूह कर काता गया होगा 

पहला-पहला सूत 

उसी समय पहले सूत से ही बुन दी गई होगी 

पाँच स्त्रियों की नग्नता 

पाँच स्त्रियाँ दुनियाँ की असंख्य स्त्रियाँ हैं 

कभी विज्ञापनों में 

कभी माँ के गर्भ में ही 

कभी पीट-पीटकर जबरन 

नंगी की जाती हुई 

और कभी-कभी तो कोई कुछ करता भी नहीं 

अपने ही हाथों उतारने लगती हैं वे अपने कपड़े चुपचाप 

अब क्या करना होगा इन्हें फिर से ढँकने के लिए? 

अख़बार में छपी है ख़बर 

पर कहता है दर्ज़ी कि नाप से कम है ख़बर 

सदन में जो बहस हुई 

नाप से कम है 

कम है नाप से कविता 

श्रीकृष्ण वस्त्रालय पर लगा हुआ है ताला 

और वह रास्ता 

जो जाता है यहाँ से गांधीनगर की ओर 

जहाँ एशिया का सबसे बड़ा कपड़ा बाज़ार है 

कहीं बीच में ही खो गया है 

तो क्या 

अब हमारी इस पृथ्वी को अपनी धुरी पर 

किसी लट्टू की तरह नहीं 

बल्कि एक तकली की तरह घूमना होगा? 

***सादर साभार प्रेषित/संबोधी पत्रिका

••••स्त्रियों का शरीर

दरअसल, फाँसी बनता जा रहा है

जैसे बनती जाती है 

चिड़िया अपने ही घोंसले में

बेगाने शत्रु के शिकार

शत्रु  जो नहीं जानता कि

नींद से जागी हुई स्त्रियों के

देह को,

 जब वो अपने ही खोल के अंदर समेट लेती हैं

तब प्रकृति भी उसके आगे विवश हो जाती है

तुम जो सोचते हो कि

जानते हो उसके अंग प्रत्यंग के बारे में 

तो जान लो कि 

तुम नहीं जानते उसके देह के विज्ञान को

अंधों की तरह टटोलते हुए 

जब पहुंचते   हो उसकी दहलीज पर

तब फेंक दिये जाते हो

स्त्री के मन, माँ की कोख, बहन की आँखों,

पत्नी के प्यार और बेटी की श्रद्धा से

जब नहीं बचता कुछ भी तुम्हारे पास 

तो छोड़ क्यों नहीं देते

 अपने ही तन को एक कालकोठरी में

जहां सबकुछ उलट जाये,

पेड़ रस्सी तोड़ दे

धर्म तुम्हारा साथ देना छोड़ दे

धरती तुम्हें गोद में लेने से इंकार कर दे

और तुम्हारा नाम तुम्हारा न होकर

'वहशी' हो जाये।

कात्यायनी दीप©

●●●

नींद में नंगी जाग गई औरत

सच में नंगी भाग रही औरत

राजा के दरबार में खड़ी है निर्वस्त्र

कौन उठाएगा इनके पक्ष में अस्त्र

नंगी औरतों की फोटो को हजार मेगा पिक्सल में फाड़ कर देख रहे लोग

नंगी औरतें तुम्हारे घरों में खाना बना रही

तुम्हारे बच्चों को स्कूल छोड़ रही

कर रही काम जंगल में खेत में

वो इतनी नंगी हैं के उन्हें नापा जा सकता है

वो इतनी निरीह हैं के उन्हें हिस्से में बाटा जा सकता है

ये इतनी काली और बदसूरत हैं के इनकी देह में ठहाके से घुस सकते लोग

लोगों के घरों में नंगी औरतें खाने की थाली लिए खड़ी है

पहचानो इन्हें 

मेरे आस पास बे इंतहा आवाज का शोर है

देश का ओर है या छोर है

कहां से आ रहीं है भीड़ की आवाज

सावन के दिनों में पेड़ों से छिली जा चुकी है हरियाली

तुम्हारे लिए तो खड़ी है घर वाली

भरी है खाने से तुम्हारी थाली

ध्यान से देखो कपड़े किधर हैं उसके

ध्यान से देखो 

हमारी आंख के पर्दे पर चल रहीं हैं  हमारे समय की औरतें

भीड़ खेल रही है इनकी देह से

गर्भ से फूट निकलेगी खून की धार

धरती जानती है बंजर होना

सूख गई इनकी छातियों की कसम

अगला जन्म सुधारना है तो इनके पक्ष में दर्ज करो अपनी आवाज

वरना जाओ और डूब मरो

©शैलजा पाठक

रात के लगभग दो बजने वाले हैं और नींद आंखों से कोसों दूर। हिला कर रख दिया दिलो-दिमाग को पहले मणिपुर और फिर मेरे शहर में हुई शर्मनाक घटना ने। अंततः कलम ले ली हाथ में... शायद बेचैनी का भार कुछ हल्का हो जाए ।

 * मृत मणियां * 

दुर्भाग्य तुम्हारा मणियों

कि तुमने विषधर के

मस्तक पर जगह पाई 

जानती हूं घिरी हो

विषैले सवालों के घेरे में 

कि बर्बरता कैसे ताकत बनी होगी

देहों को रौंद कर सांस कैसे ली होगी

वह भी केवल प्रतिशोध की खातिर ??


ओ मणिपुर की मणियों

क्यों रो रही हो 

जीते जी हुई अपनी मौत पर 

क्यों चीख रही हो इस

नपुंसक भीड़ के सामने

तुम्हारे आंसू और चीख

चर्चा और बयानों में बदल जाएंगे

खबरों में सुर्खियां जुटाएंगे

नेता अपनी रोटियां पकाएंगे ... 

भूल जाएंगे सब कुछ समय में

मदर्स-डे और वुमेन्स डे मनाएंगे

आत्म-स्तुति के आवरण में तुम्हारी 

लहूलुहान आत्मा को महान बताएंगे ....


अरे ओ मेरे शहर की तितलियों

समझ लो अब यह सच्चाई कि

हर युग में महाभारत की नींव रखी जाती है

सत्ता की चौपड़ पर

कितनी द्रौपदियां लुट जाती हैं....

हम कहां किसी दुशासन 

को पहचान पा रहें हैं

हमारी दृष्टि भी अब धृतराष्ट्र हो गई है

इंसानियत की आंखों से

शर्म की बूंदें सूख गई हैं 

                   © मीनाक्षी जोशी

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शनिवार, 1 जुलाई 2023

3805... राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस



हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...   

'नेशनल डॉक्टर्स डे' पटना के ही एक लाल की याद में मनाया जाता है। यह उनका जन्मदिवस भी है और पुण्यतिथि भी। उस लाल का नाम है डॉ. विधानचंद्र रॉय। प. बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री रहे विधानचंद्र का जन्म पटना के खजांची रोड में हुआ था।महान फिजिशियन डॉ. बिधान चंद्र रॉय पं. बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री भी थे। उन्हें उनकी दूरदर्शी नेतृत्व के लिए पं. बंगाल राज्य का आर्किटेक्ट भी कहा जाता था। 1 जुलाई 1882 को बिहार के पटना में रॉय अपनी डॉक्टरी की डिग्री कलकत्ता से पूरी की। पटना विश्वविद्यालय से गणित में स्नातक करने के बाद सन् 1901 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। वहां से एमडी किया और ऊंची शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए। वहां एमआरसीपी और एफआरसीएस की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं।इसके बाद देश लौटे और सियालदह में अपना क्लीनिक खोला। साथ में सरकारी नौकरी भी करने लगे। उसी दौरान वे कांग्रेस नेताओं के संपर्क में आए।

 चित्तरंजन दास, सुभाषचंद्र बोस आदि से नजदीकियां बढ़ीं। वे 1909 में रॉयल सोसाइटी ऑफ मेडिसिन, 1925 में रॉयल सोसायटी ऑफ ट्रॉपिककल मेडिसिन और 1940 में अमरीकन सोसाइटी ऑफ चेस्ट फिजिशियन के फेलो चुने गए।एक चिकित्सक के रूप में शुरुआत करने वाले बिधान चंद्र कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में शिक्षक भी रहे। बाद में वे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के नेता बने और उसके बाद पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री बने। 4 फरवरी 1961 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया।कलकत्ता और इलाहाबाद विश्वविद्यालयों ने उन्हें डीएससी की उपाधि दी। कलकत्ता के दो बार मेयर रहे। आजादी की लड़ाई में दो बार जेल गए। आजादी मिलने पर उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया, लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया। इसके बाद वे प. बंगाल के स्वास्थ्य मंत्री बने और फिर 1948 में मुख्यमंत्री।

इस पद पर वे अंतिम सांस लेने तक रहे। 1961 में उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। इस दुनिया में अपनी महान सेवा देने के बाद 80 वर्ष की आयु में सन् 1962 में अपने जन्मदिवस के दिन ही उनकी मृत्यु हो गयी।

इलाज के उद्देश्य के लिए शरीर और आत्मा अलग–अलग नहीं हो सकती है, वे एक और अकेले है। “बीमार शरीर के रूप में मन को ठीक किया जाना चाहिए।” जब एक बीमारी के लिए बहुत से उपचार का सुझाव दिया जाता है तो इसका मतलब यह है कि उसे ठीक नहीं किया जा सकता है।

“दवाएँ बीमारियों को ठीक करती हैं, लेकिन मरीज़ों को केवल डॉक्टर ही ठीक कर सकते हैं।” – कार्ल जंग

“हमेशा याद रखें कि एक चिकित्सक होना विशेषाधिकार है।” – डैनियल पी लोगन

“लोग चिकित्सक को उसकी परेशानी के लिए भुगतान करते हैं; उसकी दयालुता के लिए वे अभी भी उसके कर्जदार हैं।” – सेनेका

“दवाएँ बीमारियों को ठीक करती हैं, लेकिन मरीज़ों को केवल चिकित्सक ही ठीक कर सकते हैं।” – कार्ल जंग

दुनियाभर में अलग-अलग तारीख को मनाया जाता है डॉक्‍टर्स डे... सन् 1882, 1 जुलाई को भारत के एक महान चिकित्सक बिधान चंद्र रॉय का जन्म हुआ था। भारत में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पहली बार 1 जुलाई 1991 को डॉ. बिधान चंद्र रॉय के सम्मान में, स्वास्थ्य क्षेत्र में उनके योगदान को श्रद्धांजलि देने के लिए मनाया गया था।

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पुनः भेंट होगी...
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