शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कुसुम कोठारी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
ठूंठ होते पादपों पर
कोंपले खिलने लगी
प्राण में नव वायु दौड़ी
आस फिर फलने लगी
ज्योति हर कण में प्रकाशित
भोर ने ये वर दिए।।
ज़िंदगी किताब कोरी सी
हर रात हो जाती,
हर सुबह नया इक नाम चुनो !
मजरूह दिल ले कर हर क़दम मुस्कुराते हैं,
बारहा शीशा ए दिल को आज़माया न करो,
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव