सादर अभिवादन
आई रे आई रे
माताश्री
आ गई रे
ये गीत सुनिए
फिर रचनाएँ
शुभ ललिता आनंददायिनी
जीवन दात्री माँ भवानी,
मुकाम्बिका माँ त्रिपुर सुन्दरी
कुमुदा, कुंडलिनी, रुद्राणी !
शिल्पी उनकी बात चुपचाप सुन रहा था, वह बोला- 'आप लोगों में भले ही कितनी ही पारस्परिक सहयोग की भावना बढ़ जाए पर सबको एक सूत्र में पिरोने वाला तो मैं ही हूँ। यदि मेरा हाथ न लगे तो ईंट, गारा और किवाड़ अपने-अपने स्थान पर ही पड़े रहेंगे। मेरे शिल्प के बिना आपका कोई अस्तित्व नहीं।'
उसने राजनीति की गहन जानकारी एकत्रित की, देशाटन किया और हीरे को तराशता रहा। चतुर तो था ही अतः आवश्यक मार्ग और ज्ञान अपनी समझ से अर्जित कर लेता। अपनी समझदारी अपनी होती है। बुद्ध ने भी अपनी समझदारी से ही निर्वाण प्राप्त किया था – बालक ने यह बात कहीं पढ़ ली थी।
अब वो ही देखेगी
मेरे हिस्से के ख़्वाब
ओढ़ेगी चादर
ख़्वाहिशों की
भोर होने तक
घर के दालान को खाली कर
पांव फटते अंधयारे में
पहली रेलगाड़ी से
गाँव से लेकर आया था तुम्हे माँ
तुम्हारी कमजोर आँखों ने
कितना भर देखा होगा
उस सुबह अंतिम बार
अपने घर को माँ
आज बस
सादर




