सादर अभिवादन
मेरे कम्प्यूटर मे कुछ गड़बड़ी हो गई है
कल ठीक करवाने जाऊँगी
आज मिली जुली रचनाएँ पढ़िए ...
और घास पर बैठी
ओस की बूँदे भर लाऊँ
अपनी अँजुरी में ,
और सींच दूँ फिर से
एक और नींव भविष्य की
अपनी चादर बुन लेती हूँ
खुद की धुन में जी लेती हूँ
सागर लहरों की हलचल में
बूँदों की रिमझिम सरगम में
घन बीच गरजती बिजली में
अपने मनचाहे की ख़ातिर
गाते हैं सभी
यूँ तो यहाँ पर
"ये हसीं वादियाँ ..
ये खुला आसमां"~~~,
पर जानम बिन तेरे
है मेरे लिए तो ये
जैसे कोई मसान .. बस यूँ ही ...
हैं प्रेम को भूखे
भाव के भूखे
धतूरा बेल
विभूति चढ़ाय
ॐ नमः शिवाय
चेन्नई डूबे बंगलुरू डूबै, डूबे ईर और बीर
पर जब जब दिल्ली डूबै, खिंच जाए तस्वीर
बारिश की ऐसी ही किसी डुबास में छपर छपर करते लेखक के हाथ कुछ पन्ने लग गए थे, जो किसी तरह भीगने से बच गए थे। प्रस्तुत लेख और कुछ नहीं, वही पन्ने हैं जो लेखक ने जस के तस लिख दिए हैं।
मन जो नित भागा ही रहता
कही हुई को फिर-फिर कहता,
व्यर्थ कल्पना महल बनाए
इस पल में ना कभी झाँकता !
आज बस
सादर






