सादर अभिवादन
मंगल की सीधी-सादी प्रस्तुति
जो कह दिया वह शब्द थे;
जो नहीं कह सके
वो अनुभूति थी ।।
और,
जो कहना है मगर ;
कह नहीं सकते,
वो मर्यादा है ।।
...अब रचनाएँ
अम्मा औ बाबा की याद सतावे
रहि रहि करेजवा में पीर मचावे
बीरन आजु बुलैहौं,चुनरिया धानी...
आयो सावन मास चुनरिया धानी लैहौं...
झारखंड की पूर्व राज्यपाल और
अब राष्ट्रपति भवन की राह पर अग्रसर
एक आदिवासी महिला
आइए जानते हैं उनकी कहानी
ओढ़ ओढ़णी चाले टेडी
रंग बुरकावै नुआँ-नुआँ।
दिण दोपहरी सूरज ढळता
धूणी सिळगे धुआँ-धुआँ।
काळी-पीळी सज सतरंगी
फिरती-घिरती हिया छळे।।
कार्य -क्षमता कम और ज़िंदगी ऊलजलूल हरकतों में ही कटती है
बच्चे -बूढ़े सब हो रहे अभ्यस्त सबकी इसके साथ छनती है
जो रहते इससे दूर कामयाबी उनके साथ चलती ही है
कोई तो कहता है तेरी आस रहे ,
पथ के पथ पर शीर्ष दिगन्तर बना रहे ,
चलते रहने का सुख सबसे बढ़कर है ,
लिख पाऊं कुछ ऐसा जग में मान रहे !!
उस पर पत्नी कहती है काम करोगे तो व्यस्त रहोगे,
हाथ पैरों के जोड़ सलामत रहेंगे और स्वस्थ रहोगे।
जाने सरकार को क्या जल्दी थी हमें घर बिठाने की,
अभी तो हम बहुत सेवा कर सकते थे ज़माने की।
आज बस
सादर




