शीर्षक पंक्ति: युवा कवयित्री आँचल पाण्डेय जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पाँच रचनाओं के सूत्रों के साथ हाज़िर हूँ।
शुक नासिका उदार लिए स्वर्ण नथनिया।
रतनार है कपोल शिशिरयामिनी चली।
है मंद हास रेख अधर पर खिली खिली।
वो रूपसी सुहास चटक दामिनी चली।
वैसे रात का एहसास भी रौशनी के जाने से नहीं
अंधेरे के आने से होता है
क्या सो रहे हैं देश के
बुद्धिजीवी लोग सब?
या जागता है वीर कोई
ज्ञान-चक्षु खोलकर?
है धन्य-धन्य भारती की
बंद क्यों अब आरती?
चलते-चलते एक लघुकथा-
.....बेटी पढ़ाओ...बेटी बहाओ! (लघुकथा)