जय मां हाटेशवरी......
कल पूज्य पिता जी की पांचवी पुण्य तिथी थी.....
हे ईश्वर.....
इस पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान देना.....
पिता सदा परिवार को, देता शीतल छाँव।
जिसकी उपमा का नहीं, जग में है उपमान।
देवतुल्य उस तात का, करना मत अपमान।।
शहर में मज़दूर जैसा दर-ब-दर कोई नहीं
जिस ने सब के घर बनाए उस का घर कोई नहीं
बुलाते हैं हमें मेहनत-कशों के हाथ के छाले
चलो मुहताज के मुँह में निवाला रख दिया जाए
रज़ा मौरान्वी
1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस जिसको मई दिवस के नाम से जाना जाता है,
इसकी शुरुआत 1886 में शिकागो में उस समय शुरू हुई थी, जब मजदूर मांग कर रहे
थे कि काम की अवधि आठ घंटे हो और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी हो।
इस हड़ताल के दौरान एक अज्ञात व्यक्ति ने बम फोड़ दिया और
बाद में पुलिस फायरिंग में कुछ मजदूरों
की मौत हो गई, साथ ही कुछ पुलिस अफसर भी मारे गए।
नींद आएगी भला कैसे उसे शाम के बा'द
रोटियाँ भी न मयस्सर हों जिसे काम के बा'द
अज़हर इक़बाल
अब पढ़िये आज के लिये मेरी पसंदीदा......
अच्छा .......इसका मतलब माँ भी मजदूर है
वो भी दिनभर सबका काम करती है, डाँट भी खाती है ,
पर उसे तो कभी पैसे नही मिलते ।
वो अलग तरह की मजदूर है क्या ?
तुम आओ या मुझे बुलाओ
अधर में न लटकाओ
या मुझे इतनी शक्ति से भर दो
मुझे अपने पैरों पर खड़ी कर दो
मैं बिना रुके तुम तक पहुँच पाऊँ |
यहाँ की सुबह तो कीर्तन में या अज़ान में है
चलो सुनाओ किसी की ग़ज़ल अदा से मगर
तमाम रंग की ख़ुशबू तुम्हारे पान में है
पीठ पर सूरज बंधा
पेट बिलकुल खाली
कपकपाते हाथों से
बजती नहीं ताली--
आँख का काजल मिटा
मांग का सिंदूर
थरथराती देह लुटना
रॊज का दस्तूर
अंत में हम सभी भी विचार करे कि......
क्या हम स्वयम् मजदूरों को उनके श्रम के अनुसार महनताना देते हैं?....
धन्यवाद।


