शीर्षक पंक्ति:आदरणीय ज्योति खरे जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक
लेकर हाज़िर हूँ।
कल विश्व गौरैया दिवस पर प्यारी गौरैया को शिद्दत के साथ याद किया गया।
आइए पढ़ते
हैं आज की
पसंदीदा रचनाएँ-
शायद उसने धीरे धीरे
समझ लिया
आँगन आँगन
जाल बिछे हैं
हर घर में
हथियार रखे हैं
तब से उसने
फुदक फुदक कर
आना छोड़ दिया है---
गौरैया विलुप्त हो रही है
और इसे बचाने के लिए
आप लिख रहे हैं नारे
बना रहे हैं विज्ञापन
जैसे कि आप करते हैं छद्म, प्रपंच
जल बचाने के लिए
वृक्ष बचाने के लिए
बेटी बचाने के लिए
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव