सादर अभिवादन
दीदी का पाक्षिक अंक
तो मेरा भी पाक्षिक अंक
दीदी ने अगर मासिक का मूड बना लिया तो
मुझ नासमझ को इतनी अकल नहीं कि
ये तीसरा सप्ताह है या चौथा
आगे राम जी की इच्छा
चलिए रचनाओं की ओर
चमक-दमक बाहर की
श्वेत वस्त्र मन काला
तिलक भाल चंदन का
हाथ झूठ की माला
मनके पर जुग बीता
खड़ा बैर का ताना।।
कुछ अलग सा
गलत बोलने-करने वाला यह अच्छी तरह जानता है कि यदि उनके कदाचरण का विरोध सौ जने करेंगे तो उसके पक्ष में भी दस लोग आ खड़े होंगे ! उन्हीं दस लोगों की शह पर वह अपनी करनी से बाज नहीं आता ! पत्र-पत्रिकाओं में ''ये उनके निजी विचार हैं'', लिख औपचारिक खानापूर्ति कर देने से समाज में फैलाई जाने वाली कडुवाहट कम नहीं हो जाती ! इसीलिए ऐसे लोगों और उनकी बातों को बिलकुल नजरंदाज करने की बजाए बीच-बीच में गलत बातों का विरोध होना बहुत जरुरी है ! यह विडंबना है कि हमारे देश में कुछ भी बकने की आजादी तो है, पर अपना फर्ज-नैतिकता निभाने की कोई विवशता नहीं है !
जो करता था कभी हिफाज़त चरागों की,
दौर क्या बदला वो हवा हो गया,
वो मुर्दा तड़प रहा है दर्द से अभी,
कत्ल किया था जिसने अब वो ही गवाह हो गया,
आख़िर मैंने चाहना कम किया
वो कहती भी रही कम का
मगर कम भी तो कितना कम होता
अब कम क्या विलुप्त का पर्याय होगा
मगर.... चलो कोई बात नहीं
किस-किस तरह से आ गिरी रिश्तों पे बिजलियाँ,
टूटा था रिश्ता मेरा मगर सादगी के साथ ।
रिश्ता यूँ रक्खा ताक पे उसने भी इस तरह,
गुजरी हो अजनबी की जैसे अजनबी के साथ ।
मरा मानव
पर जागी मानवता
दम भर छलका करूणा का अमृत
थामने को बढ़े आतुर हाथ,
और बाँटने को
आशा का नया बीजन।
समवेत स्वर।
सृजन!सृजन!!सृजन!!!
....
आज बस इतना ही
सादर