सादर अभिवादन
भाई रवीन्द्र जी आज खो गए हैं कहीं
ताबड़-तोड़ प्रस्तुति
काग फिरे मुंडेर मापतो
मनड़े ऊपर खोंच करे।
आख्या पाणी झर-झर जावे
टेढ़ी-मेडी चोंच करे।
पातल पर खुर्चन धर लाई
काला काग जिमावे है।
पहाड़ का जीवन आसान नहीं, वैसे ही पहाड़ों पर जाना भी आसान नहीं। खासतौर से उनके लिए जो साल के 365 दिनों में से 360 दिन भुट्टे की तरह धीमी आँच पर सिकते रहते हैं। 30- 35 डिग्री के तापमान से माइनस पर पहुंच जाना पूरे तंत्र को हिला देता है। उस पर यदि आपको पहाड़ी इलाकों में चक्कर और उल्टी की समस्या हो, तब तो क्या खाक़ ही मज़ा आएगा! लेकिन इतने पर भी राहत कहाँ, अभी तो दुर्गम, खतरनाक रास्तों पर चलना शेष है। न चाहते हुए भी, बार-बार नज़रें गहरी खाई को देखती हैं और कलेजा बैठने लगता है।
कार्तिक मास सदा उर भाए।
त्योहारों में मन हर्षाए।।
शुक्ल पक्ष की षष्ठी आई।
महापर्व की खुशियाँ छाई।।
दोनों ही कान्हा के प्रिय हैं
मीरा हो या रसखान। नादान।।
जो निर्बल का बल बनता है
उसके वश में भगवान। नादान।।
तुझको विश्वास मुखौटों पे
सच्चाई कुछ तो जान। नादान।।
क्यों जला रहे हो दिए
साल भर अँधेरा बाँटने वाले?
कोई हक़ नहीं तुम्हें
कि रोशनी बिखेरने का नाटक करो.
ये कवि जो हरक्षण में जागा करते हैं,
चलती फिरती कोर्ट और तहसीलें हैं।।
...
बस
रविवार को मैं नही रवीन्द्र जी आएंगे
बस
रविवार को मैं नही रवीन्द्र जी आएंगे


