सादर अभिवादन
नवम्बर का दूसरा दिन
कल गलती हुई और सुधर भी गई
आभार सखी...
दीपमालिका का पांचदिनी उत्सव का आरम्भ हो गया है

आज धनतेरस है...इसे धन्वंतरी जयन्ती भी कहा जाता है
आपकी उत्सुकता जगाने के लिए एक चित्र
देखें और शोध करें
-दिनेश चन्द्र गुप्ता ' रविकर'
शांता सुता , दशरथ पिता हैं , मातु कौशल्या रहीं।
श्रृंगी मिले पति रूप में, हैं लोकगाथा कुछ कहीं।
श्रीराम की भगिनी मगर, तुलसी महाकवि मौन हैं।
विद्वान - विदुषी पूछते, 'यह देवि शांता कौन हैं.?'
समगोत्र थे माता - पिता, गोत्रीय दोषों का असर ।
दिव्यांग शांता से गई-चम्पावती की गोद भर ।।
सम्पूर्ण वर्णन के लिए, माँ शारदे ! तू शक्ति दे ।
माँ ! धृष्टता कर दे क्षमा , सच्ची - सरस अभिव्यक्ति दे ।
अंधेरा भागा
दीपों को देखकर
घबराया-सा।
आओ मिलकर
संकल्प करें हम
तम भगाएं।
वहां जीवन की पसरी हुई गंध
मोहक और मादक होगी
वहां उस दिन
उस कविता में
शायद तुम्हारा नाम भी हो
यदि ऐसा न हुआ तो भी
वह कविता
तुम्हारे नाम होगी ।
एक मात्र ब्राह्मणी जो थीं जिज्जी। गाँव के दिवाले की एक मात्र पुजारिन। कहते हैं कि एक बार जिज्जी हमेशा की तरह नदी में नहाने जा रही थीं। तभी उनका पाँव फिसला और जब वो गिरीं तो एक शिला के सहारे संभल पायीं। उस शिला को जब उन्होंने ध्यान से देखा तो वो ढाई हाथ ऊंची हनुमान जी की प्रतिमा निकली। जिज्जी के कहने से उस प्रतिमा को मंदिर में स्थापित करा दिया गया। कहते हैं जब से हनुमान जी की प्रतिमा की स्थापना हुई तबसे गाँव में फसल बहुत अच्छी हुई और कोई बुरी घटना भी नहीं घटी। गाँव भर में हनुमान जी की बड़ी मानता थी और हनुमान बाबा आए थे
इससे पहले
उबलते उबलते
कुछ छलक कर गिरे
और बिखर जाये जमीन पर तिनका तिनका
छींटे पड़े कहीं सफेद दीवार पर
कुछ काले पीले धब्बे बनायें
लिख लिया कर
मेरी तरह रोज का रोज
कुछ ना कुछ कहीं ना कहीं
....
इति शुभम्
इति शुभम्





