सादर नमस्कार
भाई कुलदीप जी का समाचार आया
नेटवर्क मोबाईल पर तो है पर
लेपटॉप पर कट-कट कर आ रहा है
कोई बात नहीं हम सब हैं न..
चलिए रचनाएं देखें

स्वप्नों में भयभीत हुआ मन
सीमाओं में खुद को बाँधा
कहीं नहीं थी कोई सीमा
जब भी आँख खोल कर देखा

तेरा जलवा है ही ऐसा
निगाहें टिकती नहीं
तेरे मुखमंडल पर
फिसल जाती हैं उसे चूम कर |
कितनी बार कहा तुम से
अवगुंठन न हटाओ अपने आनन से

कहानियों से क्या होता है ?
हाँ , कुछ याद रह जाती हैं ।
दिल में जगह बना लेती हैं ।
नेक इरादे तराश देती हैं ।
पर सच कहाँ हो पाती हैं ?
कहानी कहानी होती है ।

हंसी-मजाक का रिवाज
हमारी संस्कृति में
माहौल को खुशनुमा बनाने में
काफी सहायक रही है।
शादी में एक बहुत ही प्यारा रिवाज है
द्वार-छेकाई का।
जिसमें दालधोई मटकोड़
आदि की रस्में निभाकर वापस आने पर
घर पुत्रियां द्वार घेरकर खड़ी होती हैं और
सुंदर-सलोने गीत गाकर नेग मांगती है।

हो जाने दो, पलों को, कुछ और संकुचित,
ये विस्तार, क्यूँ हो और विस्तृत!
हो चुका आहत, बह चुका वक्त का रक्त,
रहूँ कब तक, मैं प्रतीक्षारत!
छाया हो तो व्यवधान हूँ
मौलिक हो तो आधार हूँ
संशय हो तो दुविधा हूँ
श्रद्धा हो तो उद्धार हूँ
झूठ हो तो विभ्रम हूँ
सच हो तो ओंकार हूँ .
....
बस
सादर
बस
सादर
