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रविवार, 7 जून 2020

1787.....काग़ज़, कलम, दवात


जय मां हाटेशवरी.....
इस करोना-काल में......
सबसे खुश शायद बच्चे ही हैं......
स्कूल में छुट्टियां......
हाथ में mobile......
Online education बच्चों को कहीं......
Mobile का आदि न बना दे......
पढ़ाई के नाम पर बच्चे.....
Mobile का दुर-उपयोग तो नहीं कर रहे......
माता-पिता  को इसका विशेष ध्यान रखना चाहिये.....
 अब पेश है.....मेरी पसंद......

सेहत
शायद इस यात्रा में
मैं गाँव पहुँच जाऊँ,
मेरी सेहत भी सुधर जाए,
आप ही कहिए
मैं सही सोच रहा हूँ न?
काग़ज़, कलम, दवात
दशहरे के अवसर पर सारे पेन धो धोकर खूब चमकाए जाते और घर के अस्त्र शस्त्रों के साथ कलम और स्याही की दवात की भी पूजा होती ! उस दिन प्रसन्नता इस बात की अधिक
होती थी कि सारे कलम पूजा के स्थान पर रख दिए जाते थे तो पढ़ाई से फुर्सत मिल जाती थी ! इस कलम और दवात से जुड़े जाने कितने संस्मरण और किस्से अभी तक मन मस्तिष्क
में बिलकुल ताज़े हैं ! स्कूल के फर्नीचर में डेस्क पर एक खाना बना हुआ होता था जिसमें स्याही की दवात आराम से फिट हो जाती थी और उसके लुढ़कने का खतरा नहीं होता
था ! सखियों सहेलियों को जन्मदिन का तोहफा एक खूबसूरत सा पेन ही हुआ करता था ! और घनिष्टतम सखी को नए पेन के साथ अपना पुराना पेन भी बड़े प्यार के साथ दिया जाता
अचरज।
 ये कौन है,
आया कहाँ से भेष धरकर,
मदमास मे बदमाश का,
नजर आता नहीं,
कहीं दूर तक कोई,
तिनका इक आश का।








कि तुम यहीं कहीं हो...
क्या ये फूल बहुत से लोगों के दिलों के जख्मों को भर पायेंगे...? क्या इनका सौन्दर्य किसी के जीवन में रोटी की कमी को पूरा कर सकेगा, या रोजगार, पुलिसिया मार
और अपमान के जख्म को तनिक भर में कम कर पायेगा?




जीवन,सत्संग,विश्वास
 हाथ बढ़े सहयोग को , समझे सबका मर्म।
मानव जीवन तब सफल , अगर नेक हो कर्म।।



तूफान
 दहशत से उभर नहीं पाए
देखा जब उत्तंग उफनती
लहरों को टकराते तट से |
गति थी इतनी तीव्र तूफान की
ठहराव की कोई गुंजाइश न थी
पर टकराने से गति में कुछ अवरोध आया
 बह कर आए वृक्षों ने किया  मार्ग अवरुद्ध |
  ताश के पत्तों से बने बहते मकान
  कितनी मुश्किल से ये बनाएगे होंगे


लो बीमारी, दो बीमारी
जैसे हो सूरत हैवान हमारी
न हम इसके
न ये हमारी
साँसें हैं मेहमान हमारी


लघुकथा- बंटवारे की अनोखी शर्त
''मेरे बेटे-बहू मेरा बहुत ख्याल रख रहे हैं और यदि वे लोग फोन में पैसे नहीं डलवाते तो मैं खुद डाल देती। अभी मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं। लेकिन हुआ ये कि गांव
से शहर आते वक्त ट्रेन में मेरा पर्स ही खो गया। मोबाइल भी पर्स में ही था। मेरे बेटे ने तुरंत ही नया मोबाइल ले दिया। लेकिन अब मेरे पास तुम्हारा नंबर नहीं
था। इसलिए चाह कर भी मैं तुम्हें फोन नहीं लगा पाई। खैर, मेरा घर पास में ही हैं। चल घर चल।''
''अं…अभी शाम के सात बज रहे हैं। बेटे का काम तो रात को नऊ बजे तक खत्म होने वाला हैं। मतलब मेरे पास दो घंटे हैं। मैं ने तब तक शॉपिंग करने की सोची थी। लेकिन
शॉपिंग अगली बार कर लुंगी। अभी तो तेरे यहां ही चलते हैं।''




धन्यवाद।
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