PRIYANKAR
यह कुसूर सिर्फ़ उनके पहनावे से जुड़ा हुआ नहीं है
न ही इतना भर कहने से काम चलने वाला कि क्योंकि वे औरतें हैं
जवाब भले दिखता किसी के पास न हो मगर
इस बारे में सोचना ज़रूरी है
जल्दी सोचो!
क्या किया जाए
दिनों-दिन बदलते ज़माने की तेज़ रफ़्तार के दौर में
जब पेन मोबाइल आई-कार्ड लाइसेंस और पर्स रखने की ज़रूरत आ पड़ी है
विश्वनाथ सचदेव
इस कविता के सवालों का कोई जवाब मेरे पास नहीं है.
पर मुझे लगता है, जब भी मैं तितली को उड़ते हुए देखता हूं,
शायद कोई जवाब मेरे आस-पास मंडराने लगता है.
पकड़ने की कोशिश करता हूं उसे,
पर तितली की तरह हाथ से फिसल-फिसल जाता है...
शशिभूषण
मेरे सब की धुरी हो तुम
मैं दूसरों की शिक़ायतें तुम्हीं से करना चाहता हूँ...
कि यह दुनिया मेरे इशारों पर नाचे तो
अकेला छोड़ दिए जाने पर
मैं तुम्हारी सुंदर आँखों और प्यारे चेहरे को याद करता हूँ...
भिखारी देखे मुझे गिरा जहाँ, था वोह कोई एक गाँधी रोड.
मुझे उठाने की चाहत में, लगाये वोह एक अंतिम दौड़.
हाय हाय रे ट्रक ने उड़ाया, खायी उसने गहरी चोट.
ढेर हो गया वोह भिखारी, मिला न उसको सौ का नोट.
और तो और पढ़ तो लेते हैं पूरी कविता
पर जब टिप्पणी देनी हो तो यूं ही सरक जाते हैं
आपके चाहे हों दो की जगह चार हाथ
तब भी आप ताली नहीं बजा पायेंगे
><><
पुन: मिलेंगे...
><><
