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शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

167...नूतन वर्षाभिनन्दन


आप सभी को नव वर्ष की शुभ कामनाएँ

चलते हैं रचनाओं की कड़ियो की ओर..

जो तुम भी कह ना पाये,
वो मेरी हथेलियों पर रची,
मेहंदी ने कह दिया है...
पिया तुमसे बहुत प्यार करते है.
मेहंदी का रंग देख कर,
मेरी सहेलियों ने मुझसे कह दिया है..


ईंट गारे चूने से बना यह भवन
केवल एक मकान नहीं है
यह तो युग-युग से साधक रहा है
हर रोज़ परवान चढ़तीं
हमारी बेलगाम ख्वाहिशों का,
हमारे बेहिसाब सपनों का,
हमारे अनगिनत अरमानों का
हमारी हज़ारों हसरतों का


बीते बरस बीत गए 
ये सोच कर की आने वाले बरस 
कैसे बीतेंगे थोड़ी सी ख़ुशी देकर 
या बेरुखी से मुह मोड़ कर 
फिर चल देंगे ,साथ छोड़ कर। 
ये क्रम यूं ही चलेगा ,


पल पल कर साल गुजर जाते हैं
हम हर साल नये साल का स्वागत करते हैं
पुराने साल की गलतियों को भूल
नये साल में फिर वो ही दोहराते हैं
फिर वो ही दुख दर्द से गुजरते हैं
कुछ खुशियाँ भी बटोर लेते हैं

कहता है पुराना वर्ष
पहुंच चुके हो जहां,
उससे आगे चलना,
रुकना नहीं
न भय लाना मन में।
जो भूल हुई,
 न दोहराना उसे,
जो न पा सके,
अब पाना उसे
इस नव वर्ष में...


नया दिन नयी कविता में
उजाला मेरा नहीं 
पर प्रकट होता है मुझसे भी जो 
उसकी स्वच्छ उजली सूरत 
आने वाले बरस के 
हर एक दिन 
हर एक पल से 
झांक कर 
सौम्यता से कर रही है 
मेरा स्वागत जैसे 



और आज की अंतिम व सामयिक कड़ी..
"सबका साथ, सबका विकास ! 
आधे को सब्सिडी , आधे को ठेंगा"
भारतवर्ष में......... 
समय-समय पर असुरों का जन्म हुआ है । 
कभी कोई आकर अखंड भारत को दो टुकड़ों में बाँटता है, 
कोई जात-पाँत में, 
कोई आरक्षण के नाम पर दो टुकड़े करता है . 

अब बस
आज्ञा दें
यशोदा











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