निवेदन।


फ़ॉलोअर

1655 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
1655 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 27 जनवरी 2020

1655..हम-क़दम का 105 वाँ अंक..चित्र

सोमवारीय विशेषांक में
आप सभी का स्नेहिल
अभिवादन
------
चित्र आधारित सृजन

जीवन की
सूखी लकड़ी की नोंक में
 सोयी नन्हीं-सी आशा,
जब अंधेरी परिस्तिथियों की
ख़ुरदरी ज़मीं से रगड़ाती हैं,
 पलभर जीने की चाह में
 संघर्षरत,
 दामिनी-सी चमककर
उजालों की दुनिया से
साक्षात्कार करवाती है।
क्षणभर के जीवन में,
टिमटिमाते असंख्य
दीप मेंं प्राण भरकर
अंधेरों के विरूद्ध
जीना सिखलाती है।

......................
कालजयी रचनाएँ

आग पर कदम ...हरकीरत हीर
तुमने मेरे
जले हाथों में
भर दी है फिर से अगन

जब तुम
जला रहे थे
मेरे हाथों की लकीरें
उस वक़्त मैं देह के ब्रह्माण्ड से
चुन रही थी
सुलगते अक्षरों के शब्द


आग और स्वाद .....आरती
कागज के कोरे टुकड़े पर लिखा ‘आग’
आग के दोनों ओर चित्र भी बनाया आग का
लो वह चित्र भी याद आया
बर्फीले पहाड़ वाला
ग्यारह साल आठ माह की उमर में बनाया था
रंगों की समझ ही कहाँ थी तब
सफेद झक्क पहाड़ों की बस्ती में

आग
यह आग ही तो है
जब दिलों में लगे
तो प्यार जगा देती है,
जब दिए में जले
तो अंधेरा भगा देती है,
जब नफ़रत में जले
तो बस्तियाँ जला देती है,

आग की भीख.... रामधारी सिंह दिनकर
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।


आग का अपना-पराया क्या? ...शिशुपाल सिंह 'निर्धन'
राख बनकर रह न जाए घर हमारा
आग से बढकर हमे है डर तुम्हारा
देश का नैतिक पतन उत्थान पर है
सभ्यता इस देश की प्रस्थान पर है
आचरण बिलकुल अपावन हो चुके हैं
हो सके तो आदमी बनकर दिखाओ
आग का अपना - पराया क्या?


.......................

चित्र लेखन का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया है
हमारे प्रिय रचनाकारों ने।
आप सभी की कल्पनाशीलता, सृजनात्मकता को
सादर नमन।
आपके सहयोग, स्नेह और दुआओं से
हमक़दम का सफ़र यूँ ही चलता रहे।

--------////////--------
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-

आदरणीय साधना वैद
माचिस की तीली
लेकिन अब डर लगने लगा है
अब इसका इस्तेमाल अराजकता और
दंगे भड़काने के लिए होने लगा है,
पेट्रोल छिड़क कर कार, बस और रेलों को
आग लगाने के लिए होने लगा है !
सन्दर्भ बदलते ही पता नहीं कैसे
कभी बहुत प्रिय लगने वाली वस्तु
अनायास ही भय का कारण बन जाती है !
माचिस की यह जलती हुई तीली
अब मेरे मन की सुख शान्ति को भी
न जाने कैसे आग लगा जाती है !

------/////------

आदरणीय आशा सक्सेना
हाथ में माचिस की तीली

हाथ में माचिस की तीली लिए 
बच्चा खेल रहा आँगन में
अरे यह किसने दी है
इसके हाथ में  
आग लगा देती है
छोटी सी चिगारी 
हाथ में माचिस की तीली  हो 

------//////-----

चिंगारी... सुप्रिया रानू
कभी कोई विवशता,तो कभी कोई मजबूरी रही,
कभी मन ही न हुआ तो कभी मेहनत से दूरी रही,
सुलगते बुझते कर ही लेता है इंसान परिस्थितियों से समझौता,
और फिर न जाने किस किस को दोष देकर
मना लेता है अपने मन को,

------/////------

आदरणीय अभिलाषा चौहान
जली तीली कहीं कोई !!
जली भावों की महफिल है,
कसक बाकी बची दिल में।
लगी छोटी सी चिंगारी,
पड़ा ये दिल है मुश्किल में।

-----///////------

आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा
जलते रहना, ऐ आग!
जलते रहना, ऐ आग!
इक सम्मोहन सा है, तेरी लपटों में,
गजब सा आकर्षण है,   
जलाते हो,
पर खींच लाते हो, ध्यान!

----/////----

आदरणीय कुसुम कोठारी
जलती तीली
तीली बस सुलगती और बुझती है
पर कुछ जलाती,जब-जब भी जलती है।
जलाने की शक्ति, जब दीप जलाती,
ज्योति से  हर कोना पावन मंदिर का भरती।
धूप की भीनी सौरभ मन को  भाती ,
भुखे उदर को देती रोटी, चूल्हा जब जलाती।
आती लाज उसे जब तम्बाकू सुलगाती,

-----//////-----

आदरणीया उर्मिला सिंह जी
एक तीली माचिस की
एक तीली माचिस की 
जला कर दीपक..... 
उजास करता..... 
आरती के थाल में सजता 
आध्यात्म की लौ से 
मन ऊर्जा से ओतप्रोत करता 
एक तीली माचिस की..... 

----//////-----

आदरणीया ऋतु आसूजा जी
आग नहीं तो क्या है
चक्षुओं से कपोलों
तक छपे अश्रुओं के
अमिट निशान
नासिका पर सूखता
द्रव्य पदार्थ
तन पर पड़ा आधा-अधूरा पट


-----//////------

आदरणीया सुजाता प्रिया जी
माचिस की छोटी तीली हूँ
माचिस की छोटी ती्ली हूँ,
जलती और जलाती हूँ।
तम हर लेना काम है मेरा,
सबको यही सिखलाती हूँ।

रात अँधेरे में मैं जलती,
अँधेरा को दूर भगाती हूँ।
लालटेन मोमबत्तियाँ जला,
घर रोशन कर जाती हूँ।

-----//////-----

आदरणीया शुभा मेहता जी
तीली
एक माचिस की 
छोटी -सी तीली 
कितनी ताकतवर !
जला देती है 
कितने ही आशियाँ...
सुलगा जाती है 
जीते -जी 
कितने ही तन
कितनी बसें ,कारें
और न जाने क्या -क्या 
बेहिसाब..............।

-----//////-----

और चलते-चलते आदरणीय सुबोध सिन्हा जी
कर ली अग्नि चुटकी में ...

यार माचिस ! ..
"कर लो दुनिया मुट्ठी में " 
अम्बानी जी के जोश भरे नारे से
एक कदम तुमने तो बढ़ कर आगे
कर ली अग्नि चुटकी में
पूजते आए हम सनातनी सदियों से
अग्नि देवता जिस को कह-कह के
यार! बता ना जरा .. मुझे भी
भेद अपने छोटे से कद के
करता है भला ये सब कैसे यहाँ
यार! बता ना जरा ...

★★★★★

आज की रचनाएँ
अति विशेष है।
इसलिए सिर्फ़ 
एक ही चित्र आज के अंक की शोभा है
बाकी की सभी तस्वीरें किसी भी ब्लॉग से
नहीं लगाये हैं।


आज का हमक़दम आपको
कैसा लगा?
आपकी प्रतिक्रिया उत्साहित करती हैं।
हमक़दम का अगला विषय
जानने के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूलें।

#श्वेता





Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...