निवेदन।


फ़ॉलोअर

1526 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
1526 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

1526...एक हम हैं कि भिड़े हैं अंतरयुद्ध में...

सादर अभिवादन। 

वे 
व्यस्त हैं 
चर्चा में 
दुनिया को 
झोंक देना चाहते हैं 
परमाणु युद्ध में 
एक हम हैं कि 
भिड़े हैं अंतरयुद्ध में। 
-रवीन्द्र  

आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें- 


My photo

इक दिन कड़ी धूप में मैंने
उसकी छाया जब माँगी तो
उसने उसकी कीमत चाही
मेरी कमियाँ मुझे गिनाईं !
मेरे पैरों के नीचे की,
धरती भी अब तो उसकी थी !!!



विकलता पर कर नियन्त्रण
पंछी दल चिन्तन करता है
सामर्थ्य हीन मानव
अपने दम पर कब पलता है
हम ढूंढे ठौर कोई
यह वही कदम धरता है 


Amrita Tanmay

अब अपने
इसतरह होने का
क्या आशय बताऊँ
या क्षितिज पर
अटकी साँसों का
केवल संशय सुनाऊँ .....



डूब के जब उभरे तो देखा, सामने केवल
डूबता किनारा ही रहा। तुम क्षितिज
पे मेरा इन्तज़ार करना, मैं  इक
मुठ्ठी उजाला हूँ, रात ढलते
बिखर जाऊँगा, रख
लेना मुझे अपने
पहलू में



अनुमान कर ही लेते हो
मेरे गहरे अवसादों की
और असीम वेदनाओं की
'पराबैंगनी किरणों' की ऊष्मा
और ... बावजूद
भौगोलिक दूरी के भी
अक़्सर सिक्त समानुभूति से 
तुम्हारी बातों की 'ओज़ोन परतें'
छा कर मेरे वजूद पर


अन्नदाता का हृदय अब हारा,कावेरी को पुकारता मिला, 
तीन पहर का खाना,वर्ष की तीन फ़सलों से नवाज़ा, 
नसीब रूठा अब उनका,जर्जर काया है मेरी, 
 एक वर्ष की एक फ़सल में सिमटी मेहनत उनकी, 
एक पहर की रोटी में बदली, 
   सीरत व सूरत और  दिशा व दशा  मेरी, 
लिजलिजी विचारधारा के अधीन सिमटी मिली |



जबरन  ब्याही  गयी  संग  कोई   और
पखेरूओं  की  फिक्र  करे   कोई   और

सुलगती  थी  वो   अब   आराम  से  है
जल पड़ी  जो  अब  बुझेगी  कोई  और


आँखें मलते हुए इस नन्हे की हथेलियों पर पहली-पहली कलियाँ आयीं हैं. जूही की कच्ची कलियाँ. गुलाबी रंग है इनका. अभी खिली नहीं हैं, अभी ठीक से मुस्कुराना भी नहीं सीखा है इन्होंने. बस कि आवाज देकर मुझे पुकारना सीखा है. मैं देर तक इन कलियों के करीब बैठी रही. जूही की इस बेल के बहाने मैंने खुद को ही तो रोपा था मिट्टी में, देखती हूँ जड़ें पकड़ ली हैं...जिदंगी का सफर चल पड़ा है. कलियों के खिलने में, खुशबू बिखरने में अभी वक़्त है लेकिन बिखरेगी जरूर.

हम-क़दम का विषय है-
सज़दा

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...