स्नेहिल अभिवादन
-------
आज तुम मेरे लिये हो
रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,
आज आधे विश्व से अभिसार मेरा,
तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।
वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,
वह सुधा के स्वाद से जाए छला क्या,
जो तुम्हारे होंठ का मधु-विष पिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो
#हरिवंशराय बच्चन
आज तुम मेरे लिये हो
रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,
आज आधे विश्व से अभिसार मेरा,
तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।
वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,
वह सुधा के स्वाद से जाए छला क्या,
जो तुम्हारे होंठ का मधु-विष पिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो
#हरिवंशराय बच्चन
हम-क़दम के विषय पर दिये गये चित्र पर
सुधि रचनाकारों से
अद्भुत रचनाएँ प्राप्त हुई है।
मंत्रमुग्ध करने वाली रचनाएँ
निःसंदेह
आपकी प्रतिभा आपकी सृजनशीलता
का परिचायक है।
हमक़दम के इस अंक में शामिल
सभी रचनाकारों को
हृदय से प्रणाम।
आपकी क़लम को हमारी
हार्दिक शुभेच्छाएँ
चलिए विलंब न करते हुये पढ़ते हैं
आज की विशेष रचनाओं को-
..................
जूड़े का हार बुलाये
कजरे की धार बुलाये
बिंदिया सौ बार बुलाये
अब तो आ जाओ प्रियतम !
नैनों का प्यार बुलाये
चितवन का वार बुलाये
सोलह सिंगार बुलाये
अब तो आ जाओ प्रियतम !
इन निगाहों ने ऐसा असर कर दिया
न मैं जिंदा रहा, और न मर ही सका।
है प्रशांत सबसे गहरा, या चितवन तेरे
डूबा मैं जब से इनमें, उबर न सका।
★★★★★
आदरणीया रेणु जी
कौन दिखे ये अल्हड़ किशोरी-सी
आदरणीया अनीता सैनी जी
वो ज़िंदगी सी लगी
नूर को न निहारा
वो यूँ नाराज़ हो गई
उसे संवारने की चाह विफल रही
अब मैं चला वो देखती रह गई
अपनी मीठी रसना से
तुमने बोले प्रीत के दो बोल
डूब गया मैं शब्दों में
जैसे अमृत का हो घोल
★★★★
न मैं जिंदा रहा, और न मर ही सका।
है प्रशांत सबसे गहरा, या चितवन तेरे
डूबा मैं जब से इनमें, उबर न सका।
★★★★★
आदरणीया रेणु जी
कौन दिखे ये अल्हड़ किशोरी-सी
मिटाती मलिनता अंतस की
मन प्रान्तर में आ बस जाए
रूप धरे अलग -अलग से -
मुग्ध, अचम्भित कर जाए
किसी पिया की है प्रतीक्षित --
लिए मन की चादर कोरी सी ! !
आदरणीया सुप्रिया रानू जी
★★★★
नार और नृत्य
जीवन मे पग पग पर,
तुमने नित नव नव रूप बनाये,
अपनी बुद्धि और आत्मबल से,
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।
★★★★
नार और नृत्य
जीवन मे पग पग पर,
तुमने नित नव नव रूप बनाये,
अपनी बुद्धि और आत्मबल से,
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।
जब आयी विषमताएं जीवन मे,
तो तुम सीता सी संग राम के वन में गयी,
और आत्मसम्मान की रक्षा में,
वही स्वरूप धरा में समाए
★★★★★तो तुम सीता सी संग राम के वन में गयी,
और आत्मसम्मान की रक्षा में,
वही स्वरूप धरा में समाए
आदरणीया अनीता सैनी जी
वो ज़िंदगी सी लगी
नूर को न निहारा
वो यूँ नाराज़ हो गई
उसे संवारने की चाह विफल रही
अब मैं चला वो देखती रह गई
अपनी मीठी रसना से
तुमने बोले प्रीत के दो बोल
डूब गया मैं शब्दों में
जैसे अमृत का हो घोल
★★★★
अभिलाषा चौहान
मैं प्रकृति हूँ, मैं शक्ति हूँ
मेरे कुंतल काले घुंघराले,
गजरों से सुंदर शोभित हैं।
ये हाथ मेरे मेंहदी वाले,
आभूषणों से सुसज्जित हैं।
मैं कमलाक्षी हूं मृगनयनी,
अधरों पर मेरे स्मित है।
मैं सौंदर्य में उर्वशी-रंभा हूं,
मैं आदिशक्ति-जगदंबा हूं।
★★★★★★★
आदरणीया आशा सक्सेना जी
रुप तेरा
★★★★★
आदरणीया मीना भारद्वाज जी
कौन हो तुम?
सलमें-सितारों वाली
धानी चुनर ओढ़े
भाल पर
चाँद सा टीका सजा
और अलकें बिखराए
घनी घटाओं का
नयनों में काजल
जूड़े में मोगरे की
लटकन लटकाए
इठलाई सी
भ्रमित हुई सी
कौन दिशा से आई हो?
★★★★★★
आदरणीय रवींद्र भारद्वाज जी
इन कजरारी आँखों ने-1
मुझे दीखते
ये तुम्हारी कजरारी आँखें
जंगल में लगी आग की तरह
फैलाती है
बेचैनी
मुझमें
मैं कहाँ चला जाऊ
कि इनसे सामना ना हो कभी
यही सोचता रहता हूँ .
★★★★★
आज का यह हमक़दम का अंक
आपको कैसा लगा?
कृपया अपने बहुमूल्य सुझाव
व
शुभकामनाएँ
प्रतिक्रिया स्वरूप अवश्य दें।
★
हमक़दम के अगला विषय जानने
के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूले।
★
तुम हो मेरे बता गयी आँखें
चुप रहके भी जता गयी आँखें
छू गयी किस मासूम अदा से
मोम बना पिघला गयी आँखें
रात के ख़्वाब से हासिल लाली
लब पे बिखर लजा गयी आँखें
बोल चुभे जब काँटे बनके
गम़ में डूबी नहा गयी आँखें
पढ़ एहसास की सारी चिट्ठियाँ
मन ही मन बौरा गयी आँखें
कुछ न भाये तुम बिन साजन
कैसा रोग लगा गयी आँखें
#श्वेता सिन्हा
आदरणीया आशा सक्सेना जी
रुप तेरा
रूप तेरा पूनम के चाँद सा
चेहरा सजा साज सिंगार से
माथे पर कुमकुम का टीका
खुशबू से अंग अंग महका |
केश विन्यास सुन्दर तेरा
बड़े सलीके से सजाया गया है
चेहरा सजा साज सिंगार से
माथे पर कुमकुम का टीका
खुशबू से अंग अंग महका |
केश विन्यास सुन्दर तेरा
बड़े सलीके से सजाया गया है
★★★★★
आदरणीया मीना भारद्वाज जी
कौन हो तुम?
सलमें-सितारों वाली
धानी चुनर ओढ़े
भाल पर
चाँद सा टीका सजा
और अलकें बिखराए
घनी घटाओं का
नयनों में काजल
जूड़े में मोगरे की
लटकन लटकाए
इठलाई सी
भ्रमित हुई सी
कौन दिशा से आई हो?
★★★★★★
आदरणीय रवींद्र भारद्वाज जी
इन कजरारी आँखों ने-1
मुझे दीखते
ये तुम्हारी कजरारी आँखें
जंगल में लगी आग की तरह
फैलाती है
बेचैनी
मुझमें
मैं कहाँ चला जाऊ
कि इनसे सामना ना हो कभी
यही सोचता रहता हूँ .
★★★★★
आज का यह हमक़दम का अंक
आपको कैसा लगा?
कृपया अपने बहुमूल्य सुझाव
व
शुभकामनाएँ
प्रतिक्रिया स्वरूप अवश्य दें।
★
हमक़दम के अगला विषय जानने
के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूले।
★
तुम हो मेरे बता गयी आँखें
चुप रहके भी जता गयी आँखें
छू गयी किस मासूम अदा से
मोम बना पिघला गयी आँखें
रात के ख़्वाब से हासिल लाली
लब पे बिखर लजा गयी आँखें
बोल चुभे जब काँटे बनके
गम़ में डूबी नहा गयी आँखें
पढ़ एहसास की सारी चिट्ठियाँ
मन ही मन बौरा गयी आँखें
कुछ न भाये तुम बिन साजन
कैसा रोग लगा गयी आँखें
#श्वेता सिन्हा
