।।भोर वंदन।।
और एक सुबह मैं उठूंगा
मैं उठूंगा पृथ्वी-समेत
जल और कच्छप-समेत मैं उठूंगा
मैं उठूंगा और चल दूंगा उससे मिलने
जिससे वादा है कि मिलूंगा।
- केदारनाथ सिंह
हैं न..ये मिलती जुलती बातें ..
इसी वादे के साथ आज की लिंकों में शामिल रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें और विचारों से जरूर मिलें..✍
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी,
आदरणीया नुपुरम जी,
आदरणीया अनीता सैनी जी,
आदरणीय नीलांश जी,
कैसे ज़िन्दा ये सुख़नवर है कई सदियों से ।।
लूट जाते हैं यहाँ देश को कुर्सी वाले ।
देश का ये ही मुक़द्दर है कई सदियों से ।।
क्या बताएंगे मियाँ आप तरक्क़ी मुझको ।
शह्र में भूख का मंजर है कई
पथिक,
चलते रहना
तुम्हारी नियति है.
पर यदा-कदा
विश्राम करना.
चना-चबैना
जो अपनों ने
साथ बांधा था,
उस पाथेय से भी
न्याय करना.
दरियादिली में डूब गया,जिंदगी को गया भूल महंगाई को सर पर बिठा,आम इंसान दर्द में रहा झूल |
मोहब्बत की मारामारी,सभी को एकबीमारी,
धुन वो मौसम सा नहीं ,एक सवेरा है
धुन मुझे मेरा ही ले जाए दूर कहीं ,
मन को रोके हुए वो एक सपेरा है
जहर जुबां का ढाता कहर,
जिंदगी होती दोजख और बेजार।
टूटते दिल शब्दों की मार से,
तीर और तलवार से भी,
तेज होती इनकी धार
पनपतीे विष की अमर..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह'तृप्ति'..✍




