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बुधवार, 21 नवंबर 2018

1223..लड़ रहा अपनी हदों से ..

।।भोर वंदन।।
कुछ इस तरह से शामिल हूँ 
आज की विचारों से कि हर्फों के गौहरों में से एक गौहर चुनना मुश्किल हुए जाती..
फिलहाल इन लिंकों का लुत्फ़ उठाए..✍
🎆
आदरणीय डा०वर्षा सिंह की गजल..

आदमी अंधी गली में ढूंढता है आसरा 
आजकल खामोश ‘मोचीराम’ ‘धूमिल’ का हुआ
 बोलता था तांत की तनकार में हरदम खरा
इक अजब सी तिक्तता घुलने लगी है स्वाद में 
🎆
ब्लॉग चिकोटी से व्यंग्य..

सुनने में पहले जरूर थोड़ा अटपटा टाइप लगता था। मगर अब आदत-सी हो गई। यों भी, आदतें जितनी व्यावहारिक हों, उतनी ठीक। ज्यादा मनघुन्ना बनने का कोई मतलब नहीं बैठता। यह संसार सामाजिक है। समाज में किस्म-किस्म के लोग हैं। 
🎆
आदरणीया आशा सक्सेना जी की
 खुबसूरत रचना..

कौन कहता है कि
हमने गम नहीं देखा 
हमने बहुत गम खाया है 
हर बात पर पलटवार न करके 
मन को समझाया है |
🎆
आदरणीया अनुराधा जी  ....मेरे मन के भाव

कुछ खट्टी
कुछ मीठी
स्मृतियां होती हैं
तन्हाइयों की साथी
कुछ स्मृतियां
मन को बहलातीं..
🎆
भाव-यवनिका : आदरणीय पंकज त्रिवेदी जी की

रचना के साथ आज यहीं तक..
मैंने कुछ लोगों को देखा है
मैंने कुछ लोगों को देखा है
जो बहुत चुपके से आपके
जिस्म को छू लेते हैं जैसे
रेंगता हुआ कीड़ा !
आपके जिस्म में छेद करके
धीरे धीरे वो अंदर तक उतर जाएं

हम-क़दम के छियालिसवांं विषय
यहाँ
देखिए

🎆
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍


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