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शनिवार, 21 नवंबर 2015

दरिया





सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

पुकारते हैं दूर से वो फासले बहार के
बिखर गयें थे रंग से जो किसी के इन्तेजार से
लहर-लहर में खो  चुकी
बहा चुकी कहानियां
सुना रहा है ये शमां सुनी सुनी सी दास्ताँ

जहाँ दरिया समंदर से मिला , दरिया नहीं रहता


एहसास की लहरों पर

पानी के तेज़ बहाव के माध्यम से ही
हम अपना हाल
इक दूसरे से साँझा कर पाते हैं!
ये कश्तियाँ सन्देश वाहक हैं
जो तुम तक मेरे प्रेम का संचार करती हैं!


दर्द का दरिया बहने लगा

मै सीमा जी के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए
आशावान हूँ की उनकी लेखनी अनवरत साहित्य जगत की सेवा में सृजन करती रहेगी .
विरह के रंग घुल कर बहे तो दर्द का दरिया बहने लगा
यही प्रेम का रूप शास्वत, हर लफ्ज़ इसका कहने लगा


शब्द ढलें तो ढाल बनाओ

शब्दों के सांचे में उसको ढाल रहे हैं वह तो 'सच' को सचमुच मार रहे हैं
वेदना के सांचे में शब्दों को ढालो
चीख उठोगे जिस भाषा में कविता उसमें बन जायेगी
इस शब्दों को पीटो अपनी पीड़ा से तुम ...पैने थोड़े बन जायेंगे
उनसे तुम तलवार बनाओ


दरिया में कई क़तरे होते हैं

न कोई हकीक़त, न ही वज़ूद
फिर भी तेवर लिए हुए,
ये क़तरे होते हैं,
मिटने का ग़ुरूर कहें
या कहें किस्मत इनकी,
बस ज़ज्ब-दरिया में
फ़ना क़तरे होते है,

दरिया से न समंदर छीन


 फिर मिलेंगे
तब तक के लिए
आखरी सलाम



विभा रानी श्रीवास्व





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