सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
कब मिला है , जितना मिलना चाहिए
कुर्सी से चिपकते , सब भूल जाते हैं ...
सच्चाई का जुनूँ उतरते ही हम मालामाल हुए |
हर सूँ यही हवा है रिश्वत हर ताली ताली है ||
वो सावन के अंधे हैं उनसे मत पूँछो रुत का हाल |
उनकी खातिर हवा रसीली चारों सूँ हरियाली है ||
तेरी वहशत , तेरी उम्मीदें और तेरे ख्याल
तेरी हसरत , तेरी यादें और तेरे ख़्वाब
बड़ी मसरूफियत रहती है , इन दिनों मुझे
पिछले दिनों हमने अपनी ’ई-बुक’ बनाई- ’पुलिया पर दुनिया’।
इस किताब में हमने ’सर्वहारा पुलिया’ पर बैठे लोगों से बातचीत करते हुये
जो पोस्ट फ़ेसबुक पर अपलोड की थीं उनको इकट्ठा करके किताब बना डाली।
अपलोड कर दी। अब इसको लोग आनलाइन खरीद सकते हैं।
अभी तक कुल 44 किताबें बिक चुकी हैं।
इस खबर में उसका भी जिक्र करना चाहता हूं
खबर के अंदर तस्वीरें भी डालना चाहता हूं
उन पलों की जिन्हें मैं जी ना पाया
जिनको जीने की उतनी शिद्दत थी
जिनको जीना जीने की इक इबादत थी
तेरा अपना खाली कुठला
थोड़ी-सी अकल काम ले
अब तो मेरे भाई!
पकी फसल की मेंढ़ों पर
सींग उठाकर डट जा
बेहतर होगा, सब बेहतर होगा,
आपको मेरी है सलाह,
माता पीता के प्यार के लिए,
हमेशा करें प्रयास,
फिर तो मिल जायेगा,
सच तो यहीं है की ना मुझे ठीक से हिन्दी आती है, ना कोई अंग्रेजी का अख़बार बिना रुके पढ़ सकता हूँ | अटक-अटक कर पढ़ने के बाद भी तर्क और तुक्के पर पूरी तरह निर्भर रहता हूँ |
मुझे अपनी बात ज्यादा लोगों तक पहुँचानी है और कई भाषाओँ का अच्छा ज्ञान
एक तरह से मददगार या वरदान सिध्द हो सकता है |
लेकिन मुझे इसके लिए बहुतों की नाराज़गी सहनी होगी फिर भी मुझे उनकी परवाह है,
वो मेरी बात ना समझें पर मैं उनकी कहीं हर बात समझता रहूँगा |
फिर मिलेंगे ...... तब तक के लिए
आखरी सलाम
विभा रानी श्रीवास्तव