सादर नमस्कार
दिसंबर की सुहानी सुबह
मैं परिचय करवा रही हूँ
डॉ. रश्मि ठाकुर से
आपसे मैं भी परिचित नहीं हूँ
प्रस्तुत है प्रथम पूज्य के चित्र के साथ प्रथम रचना
मालिक से नज़रें बचा कर,
कुछ डरे और कुछ सकुचा कर,
धरती का एक छोटा टुकड़ा,
मैं चुरा ले आयी हूँ।
रिक्शा वाले पड़ोसी से,
कुछ आसमान मांग लायी हूँ।
तुम्हारा आना जो तय है,
पर यादों के धागे
कायनात के लम्हें की तरह होते हैं
मैं उन लम्हों को चुनूँगी
उन धागों को समेट लूंगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
रुको !दो घड़ी,
कुछ सांस ले लें,
हम भी, तुम भी,
कुछ गुफ्तगू कर लें,
हम भी,तुम भी
आगे भी क्या बेदम दौड़ना है?
या फिर समय की गति को तोड़ना है?
मन के किसी कोने से निकल आते हैं,
दबे पांव...शब्द!
कुछ छोटे,कुछ बड़े,
कुछ सीधे, कुछ पड़े,
कुछ नए,कुछ पुराने,
कुछ जाने,कुछ अनजाने,
कुछ शराफत से पंक्ति में बैठ जाते हैं,
कुछ शरारत से इधर उधर भागते हैं,
पकड़ती हूँ,पर फिसल जाते हैं,
कुछ मुँह चिढ़ा कर निकल जाते हैं,
ढूढ़ती हूँ ,पुचकारती हूँ,
Leaf by leaf the pain dripped ,
Baring brown and foliage stripped,
My suitcases packed, I went away,
To join ,what life held in fray.
The tree wept.
मैं न जानूं, पर पर मेरे,
सौभाग्य सदा संग चलता है।
नाविक के तीर कमानों में,
हिंसा का हलाहल पलता है।
काल चक्र की वक्र गुफा से,
गुंजित मैं निर्भीक उद्घोष हूं।
इस मेले में चले अकेला,
मैं निस्पृह-सा अल्बाट्रोस हूं।
मई 2022 में प्रसवित ये ब्लॉग
पैदल चलना भूल आज दिसंबर तक अक ऊँची छलांग लगा गया
पैदल चलना भूल आज दिसंबर तक अक ऊँची छलांग लगा गया
मेरे सभी ब्लॉगर साथियों की प्रतिक्रियाएं पढ़ी मैंने इस ब्लॉग में
डॉ. ठाकुर अब किसी परिचय की मोहताज नहीं है
आज इतना ही
सादर





