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गुरुवार, 17 सितंबर 2026

4868 ..दिन , तारीखें , महीनें , साल निकल जाने वाला है

 सादर अभिवादन

आज विश्वकर्मा जयंती है


भाई रवींद्र जी को आज आना था
लगता है कल गणेश पंडाल में कुछ ज्यादा ही
नाच लिए

देखिए रचनाएं....



दिन , तारीखें , महीनें , साल  निकल जाने वाली है
तुम चलते रहो , एक  समय  मंजिल तक पहुँच जाओगे
गोया मुस्कुराते  नहीं , मुस्कराओं  चलते  जाओ
मुसाफिरी  अभिमानी  नहीं , ईर्ष्या  नहीं  द्वेष  नहीं





यूं खुश होने को कई बातों पर खुश हुआ जा सकता था। और न जाने कितनी ही वजह थीं फफक फफक के रो लेने की। पर ऐसा कुछ न हुआ। ये किस कदर मुफ़लिसी के दिन हैं, कि साथ चलने को कोई उदासी भी नहीं, छूटने को कोई साथ भी नहीं। 
किसी ख़्वाब के टूट जाने का डर भी नहीं।





प्रेम शाश्वत है। उसे सीखा नहीं जाता, फिर भी जीव-जगत परस्पर जीवन जीने के लिए उसके व्यवहार और उसकी भाषा सीखता है। शायद प्रेम को नहीं, प्रेम के लेन-देन को सीखना पड़ता है।
स्त्री ने भी प्रेम के बारे में बहुत कुछ सीखा है। लेकिन सदियों से उसे प्रेम करने से अधिक प्रेम की प्रतीक्षा करना, दूसरों पर अपना बहुमूल्य लुटाना सिखाया गया। किसी को दुःख न हो, इसलिए स्वयं सह लेना। संबंध बना रहे, इसलिए अपनी सुविधाएँ छोड़ देना। और दूसरे की जरूरतों को अपनी जरूरतों से पहले रखना। इन सबको स्त्री के प्रेम के प्रमाण के रूप में देखा गया। लेकिन इस पूरे अभ्यास में एक प्रश्न अक्सर अनकहा रह गया। स्त्री की अपनी इच्छा कहाँ है?


खोये कहाँ हैं, अब किधर पहचान है बाक़ी, 
उखड़ी सी हैं साँसें, मगर अरमान है बाक़ी।


सादर समर्पित
वंदन

2 टिप्‍पणियां:

  1. भगवान श्री विश्वकर्मा जी को नमन
    सादर समर्पित

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात! विश्वकर्मा पूजा पर हार्दिक शुभकामनाएँ, सुंदर प्रस्तुति!

    जवाब देंहटाएं

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