शीर्षक पंक्ति: आदरणीय राहुल उपाध्याय जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में आज पढ़िए पाँच
चुनिंदा रचनाएँ-
आ गईं दिवस इक देवि गंगा,
था साथ में उनका पुत्र
देवव्रत।
कर रही प्रार्थना अब गंगा थी,
भगवन! शिष्य बना लो
देवव्रत।।
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पर इतना ज़रूर है
कि वफ़ादार
एक किरायेदार है
जिसे मकान मालिक
कभी भी निकाल सकता है
किराया बढ़ा सकता है
यहाँ यह मत करो
वहाँ ये मत करो
इतनी बजे बाद यह मत किया
करो
50 प्रतिबंध लगा सकता है
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परम कृपा के हम अभिलाषी
वाणी मधुर, शुद्ध हो जाये,
भाषा का विकास हो प्रतिपल
शब्दों में भी मौन समाये!
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राष्ट्र निर्माता और संस्कृति संरक्षक होता है शिक्षक
यस्यागमः केवल जीविकायां तं ज्ञानपण्यं वाणिजं वदन्ति।। "
इसलिए जीवन में न तो अपनी तारीफ सुनकर घमंड करना चाहिए और न
ही किसी को इतना सिर पर चढ़ाना चाहिए कि वह दूसरों को छोटा समझने लगे। असली ताकत
ऊँची आवाज़, रौब या दिखावे में नहीं, बल्कि
अपने व्यवहार, संयम और विनम्रता में होती है। जो लोग खुद को साबित करने के
लिए शोर नहीं मचाते, उनका खामोश आत्मविश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनता है।
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बेहतरीन अंक
जवाब देंहटाएंआभार
सादर
वंदन
बेहतरीन काव्य संकलन।
जवाब देंहटाएंसुप्रभात!! सराहनीय रचनाओं का सुंदर संकलन, आभार रवींद्र जी!
जवाब देंहटाएंसुंदर अंक !
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