सादर अभिवादन
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026
4885 ...शादी के बाद उसे रोज़ बनाना पड़ेगा ऐसा सूप यह तो तय है
रविवार, 4 अक्टूबर 2026
4884...जीवन टूटा शहर बना...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय नीरज कुमार जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा
रचनाएँ-
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम …
भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है
मैं अपनी तूलिका से बना दूँगी वहाँ
महकते फूल सितारे दमकता चाँद
और खूब सारे हंसते खिलखिलाते
चेहरे मासूम बच्चों के…!!
*****
वो पूछते हैं क्यों फ़ना
रखोगे
तो, ईश को कब तक मना रखोगे ?
कैसे होगी जीत बाज़ी की तब,
जब दाँव अपना बेमाना रखोगे !!
न घर बना ना असर बना ,
जीवन टूटा शहर बना I
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 3 अक्टूबर 2026
4883..ढूँढ़ रहे हैं प्रीत..
शनिवारिय भोर और साहित्यिक सृजन की पेशकश कुछ इस प्रकार से ..✍️
कहते दुख में डूबकर, मिला न सच्चा मीत।
स्वारथ मन में है भरा, ढूँढ रहे हैं प्रीत।।
ढूँढ रहे हैं प्रीत, प्रेम की बात न जाने।
छल-छद्मों में डूब, प्रेम को सौदा माने
कहे सुधा सुन मीत, परख जो निज मन लेते,
बनते सच्चे मीत, मित्र हित बात हैं कहते।।
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026
4882....बापू आ ही जाना याद
शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
कोई व्यक्ति महान पैदा नहीं होता है
उसके विचार और कर्म की शुद्धता
ही उसे आम लोगों से अलग देखने पर मजबूर करती है।
करोड़ों भारतवासियों के जीवन में बदलाव
लाने का आजीवन प्रयास करने वाले
बापू को सादर प्रणाम।
उनके द्वारा बतलाया गया
सत्य और अहिंसा का मार्ग समाज में शांति और सद्भावना का संदेश है ऐसा विश्व भी मानता है।
★
सरलता,सादगी,विनम्रता,कर्मठता और जनकल्याणकारी भावना उनके उत्कृष्ट व्यक्तित्व को विशेष बनाता है।
हमारे राष्ट्र नायक को सादर प्रणाम।
★★★
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026
4881 ...जागी आँखों में कोई ख़्वाब आ गया था
सादर अभिवादन
खास जानकारी
इस शनिवार से पम्मी सिंह जीआएंगी
सादर शुभकामनाए नए प्रभार हेतु
बुधवार, 30 सितंबर 2026
4880..क्या लिखा जाए..
।।प्रातःवंदन।।
"शब्द
मालूम है
व्यर्थ नहीं जाते हैं
पहले मैं सोचता था
उत्तर यदि नहीं मिले
तो फिर क्या लिखा जाए
किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा-
लिखा कर
तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे
एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए
अब मैं लिखा करता हूँ
अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने
कागज पर बस उतार देता हूँ।"
त्रिलोचन
बुधवारिय प्रस्तुतीकरण के क्रम को बढाते हुए आज इन लिंको पर पड़ी ..जो इस प्रकार से है
बहला रहे हैं सब यहाँ, अब कौन है अपना
कहने को हैं सदाएँ संग, बस मौन है अपना..
✨️
नाम...
तुम्हारा नाम याद करने की कोशिश कर रही हूँ
जाने किस नाम से पुकारती थी तुम्हें उन दिनों…
चेहरा एकदम साफ़ उतर आता है आँखों के आगे
जैसे सामने देख रही हूँ कोई..
✨️
वे कहते है कि लोगों को हँसाना एक कला है |
मैं कहता हूँ कि वे लोग जो हँसते है दुनिया के सामने
उन्हें अपने कंधे पर सर रखकर रो लेने देना असली कला
✨️
हवा की बरजोरी,
शाखा का सिहरना।
टहनी की गलबाँही,
पलक मिलमिलाना
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️
मंगलवार, 29 सितंबर 2026
4879....ना ही आए लौटकर ही
भाव और वस्तुएँ संचित हैं
पर मन की भूमि
करुणा और संवेदना के बिना
सूख रही है
मानव-मन इस धरा की सुंदरता
पर कभी रीझता ही नहीं।
वही पुराने ढर्रे, वही संकीर्ण रवैये,
वह तो अपनी चेतना पर नैतिकता की
अपने अहंकार में
सच्चा सबक कभी सीखता ही नहीं।
शब्दों का बाज़ार लगा है
नज़्म की महफ़िलें सजती हैं यहाँ,
पर खो गई है मानवीय संवेदना,
केवल खोखले शब्द बचे हैं,
अंतर्मन की परतें अनछुई ही रह गयी...।
पारिजात और कनेर मदमाती बूंदों की
छुअन से मदहोश झूम रहे है
सलेटी आकाश, नशीली हवा, और
भीगी सड़कों के बीच
प्रकृति का संगीत सुनकर
दादुर, मोर और कोयल बाहर निकल आए हैं।
शीतल फुहारों से महक से अनजान
सिर पर बोझ उठाए गुज़रती है एक मज़दूरिन...
उसका पसीना वर्षा की बूँदों में मिलकर
उसके चेहरे को एक अनूठी चमक दे रहा है।
किसी के लिए बरखा
मौसम का उल्लास उल्लास है
किसी के लिए सरदर्दी
लेकिन जिसने जीवन को उसकी संपूर्णता में
स्वीकार किया
वही कुदरत का सच्चा साथी बनकर
भीतर से परम सुख और आनंद से भर पाता है।
पर
क्या सचमुच आनंद मिल पाता है
किसी पर किया गया अंधा ऐतबार
बेइंतहा रुलाता है,
और बेसबब इंतज़ार ने....
ज़िंदगी को बेचैनी में बदल दिया।
क्यों करते हैं लोग दावा
रूह और जिस्म के एक होने का
जब ज़िंदगी की सारी
ख़्वाब और ख्वाहिशें किसी मोड़ पर
अधूरा छोड़ जाना है
उन्हें किसी की मासूमियत पर भी
तरस नहीं आता
बेवफ़ाई चुनना कोई मजबूरी होती है क्या?
जो किसी के सच्चे ऑंसू और बेइंतहा दर्द
कोई देख नहीं पाता
शायद आगे बढ़ गये जो
पर उस दिल का क्या
जो इतने जख़्म खाने के बाद भी
ऑंखों में उनकी तस्वीर सजाये
चौखट पर चाहतों की पवनघंटियॉं लटकाए
उसकी प्रतीक्षा कर रही है।
जीवन सीधा दिखता है,
पर भीतर उलझनों के अनगिनत मोड़ हैं।
जन्म और मरण के बीच
सजा है एक
चारों तरफ़ मोह का चौखटा,
और ढलती शाम में स्याह होते परिंदे।
मासूम राहगीर अतीत के पानी में
अपनी ही परछाईं छूने को भटकते हैं।
सामने टंगा है आईना,
पर उम्र भर ख़ुद से मिलने की मोहलत नहीं।
धूप-छाँव का यह खेल,
और जन्म-मृत्यु का यह रहस्यमय कैनवास...
अविराम चलता रहता है।







