निवेदन।


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गुरुवार, 10 जुलाई 2025

4445...गुरू शिष्य के खोलता, सारे ज्ञान-कपाट...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

Guru Purnima 2025 : जुलाई की इस ...

चित्र साभार:गूगल 

आज आषाढ़ मास की पूर्णमासी /पूर्णिमा तिथि है। भारतीय कालदर्शक में महीने में दो तिथियाँ महत्त्वपूर्ण होती हैं आधा महीना बीतने पर अमावस्या और महीना पूर्ण होने पर पूर्णिमा। अर्थात कल से बहुप्रतीक्षित सावन का महीना शुरु हो जाएगा। आषाढ़ की पूर्णिमा गुरु-पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है। गुरु-शिष्य परंपरा में इस तिथि का विशेष महत्त्व है। भारतीय जीवन दर्शन में गुरु-शिष्य परंपरा जैसे सांस्कृतिक स्तंभ आज भी आस्था के साथ स्थापित हैं।

आपको 'पाँच लिंकों का आनन्द' परिवार की ओर से गुरु-पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।

आइए पढ़ते हैं आज की रचनाएँ-

दोहे, गुरु पूर्णिमा (डॉ. रूप चन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उच्चारण

चलो गुरू के द्वार पर, गुरु का धाम विराट। 

गुरू शिष्य के खोलता, सारे ज्ञान-कपाट।। 

-- 

इस अवसर पर कीजिए, गुरुसत्ता को याद। 

गुरुओ को मत दीजिए, जीवन में अवसाद।।

*****

छील कुछ दिखा कुछ हाथी के ही सही

उबलते दूध के उफना के

चूल्हे से बाहर कूदने के

समीकरण बना

फिर देख

अधकच्चे

फटे छिलकों से झाँकते

मूंगफलियों के दानों की

बिकवाली में उछाल

*****

रोला छंद --आह्वान

घेर खड़े तूफान,कभी मत तू घबराना।

अपने प्रण से आज,जीत तू बाजी जाना।।

छुपे बादलों बीच, सूर्य फिर भी कब छुपता।

चंद्र अमावस लुप्त, पूर्णिमा पूरा दिखता।।

*****

अजब-ग़ज़ब

इस पार्क का निर्माण 1552 में प्रिंस पियर फ्रांसेस्को ऑर्सिनी ने करवाया था. इस राजकुमार की कहानी दर्द भरी है जिसे विसिनो के नाम से भी जाना जाता है. राजकुमार हाल ही में एक क्रूर युद्ध से गुजरा था, उसके दोस्त की हत्या कर दी गई थी, फिरौती के लिए उसे वर्षों तक रखा गया था, और वह अपनी प्यारी पत्नी की मौत का शोक मना रहा था. दुःख से परेशान, राजकुमार एक चौंकाने वाला "विला ऑफ़ वंडर्स" बनाना चाहता था और उसने ऐसा करने में उसकी मदद करने के लिए वास्तुकार पिरो लिगोरियो को काम पर रखा था. इसी प्रयास का नतीजा यह बगीचा है.

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 


बुधवार, 9 जुलाई 2025

4444...बस्ती में रौशनी है अभी..

 ।।प्रातःवंदन।।

"तेरी साजिश में कुछ कमी है अभी

मेरी बस्ती में रौशनी है अभी

चोट खाकर भी मुस्कुराता हूँ

अपना अंदाज़ तो वही है अभी

हस्तीमल हस्ती

जिंदगी इन्हीं साजिशों के बीच कुछ पल बिताइए सुकून के चुनिंदा लिंकों पर..

कीमत ( लघुकथा)

हरे धनिए का डिब्बा खोला तो देखा काफी सड़ा पड़ा था। मेरी त्योरियाँ चढ़ गईं। कल ही तो आया था, गुड्डू से कहा था, जा भागकर एक गड्डी हरा धनिया ले आ।सोचा दस- बीस का होगा , लेकिन सब्जी वाला निकला महाचतुर, बच्चा समझ कर सौ का नोट धरा और मोटी सी गड्डी हरे धनिए की थमा दी।

"बताओ फ्री में मिलता है, सौ का नोट रख..

✨️

अहमदाबाद टु लंदन

 •एक उचाट सा मन लिए

कोने कोने घूमता हूँ

मैं गैटविक हवाई अड्डा

हर गुज़रने वाले चेहरों मे

ए आई वन सेवन वन के यात्रियों को खोजता हूँ..

✨️

"पहाड़ों की गोद में बसा एक दिल "

रानीखेत….रानीखेत से यूँही कुछ 20 किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है सौनी, वही सौनी जिसकी हर एक ईंट पर स्वर्गाश्रम बिनसर महादेव का आशीर्वाद है। 

जहाँ हवा में ठंडक और स्मृतियों में गर्माहट बसती है, इस गाँव ने देश को अच्छे इंजीनियर, डॉक्टर , सरकारी अधिकारी और शिक्षक दिए है। 

गाँव की शुरुआत की पहली इमारत ही शिक्षा का मंदिर है। एक सरकारी स्कूल जहाँ मेरी माँ ने अपने जीवन के कई साल सहायक अध्यापक के तौर पर दिए है। 

इसी प्राइमरी स्कूल के एक छोर पर है आँगन बाड़ी..

✨️

अधूरा अभियान - -

ऐनक की खोज में नज़र खो आए हम,

बंजर ज़मीन थी या खोखले बीज,

मुद्दतों से तकते रहे कोई अंकुर

तो उभरे सुबह की नरम

धूप में, उम्मीद का

पसारा ले कर..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️

मंगलवार, 8 जुलाई 2025

4443...उपेक्षाओं का ढेर...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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शीशा है ज़िंदगी यारो
जैसी सूरत बनाओगे
वैसी ही तस्वीर पाओगे
जीना तो  है हर हाल में 
गम़ रोको हँसी की ढाल में
चुनना हो गर जीवनपथ पे
 अनदेखा कर के आँसू यारों
प्यारी-सी मुस्कान उठा लो
बच्चे,बूढ़े,जवान,स्त्री या पुरुष हर किसी के चेहरे पर सबसे
प्यारा लगता है मुस्कान का गहना।
तन का बहुमूल्य श्रृंगार जिससे व्यक्तित्व निखर जाता है जिसे
 देखकर सुखद अनुभूति होती है।
आपने कभी महसूस किया है प्रकृति की मुस्कान,
फूल,तितली,पेड़,बादल ,झरने,बारिश,धूप
हवाएँ,चिड़िया, सब मुस्कुराते है और
जगत में प्राण की संजीवनी 
प्रवाहित करते हैं।
मन अगर उदास हो तो किसी मासूम-सी
मुस्कान का जादू चल ही जाता है।
तो चलिए प्यारी सी मुस्कान के साथ
पढ़ते हैं-
आज की रचनाएँ-


कहीं दूर वादियों में उतरते हैं घने बादलों के डेरे,
बियाबां के बाशिन्दे आख़िर जाएं तो कहाँ जाएं,

फूलों की रहगुज़र में हम छोड़ आए दिल अपना,
कोहसारों के दरमियां भटकती हैं ख़ामोश सदाएं



थोड़ा सोचिए कि वाशिंग मशीन और हमारा जीवन भी कुछ मिलता जुलता है। कितनी अपेक्षाओं, आकांक्षाओं और उपेक्षाओं का ढेर हमने भर रखा है मन की टंकी में। प्रतिक्षण किनारे तक भरी हुई और क्षण क्षण रीतती हुई मन की टंकी । इसका पानी का लेवल सही बना रहे इसके लिए अथक प्रयासों का बिलोना करता हमारा शरीर, मन और प्राण। पता ही नहीं चलता , कब पानी ज्यादा भर गया तो मशीन अटक गई, पानी कम पड़ गया है तो भी अटक गए। 


जो भ्रमित करता रहा है 
 पकड़ी है प्रकाश की डोरी
जीवन जैसे एक किताब कोरी 
जिसमें लिखा जाना है 
हर पल एक शब्द नया
 हो चाह कोई भी 
मन सरवर कर देती है गंदला


उन यादों के झुरमुट से कुछ खुशियाँ, कुछ अच्छे अनुभव और ज्ञान लेकर झटपट वर्तमान की झोली में डाल नकारात्मक अनुभवों की यादों को लेट गो करके तटस्थ भाव से वर्तमान पर ध्यान केन्द्रित कर पाएं तो ठीक वरना 'बीती ताहि बिसार दे'  की कहावत ही सही क्योंकि कहीं हमारे अतीत से जुड़ी ये कुछ नकारात्मक यादें हमारे अवेयरनेस को बोझिल कर हमारे आज की खुशियों को भी फीका ना कर दें ।



इस पवित्र पर कठिन यात्रा में भाग लेने वाले कांवड़िए अपनी पूरी यात्रा के दौरान नंगे पांव, बिना कावंड को नीचे रखे, अपने आराध्य को खुश करने के लिए सात्विक जीवन शैली अपनाए रखते हैं ! यात्रा में तामसिक भोजन, दुर्व्यवहार, कदाचार पूर्णतया निषेद्ध होता है ! यहां तक कि एक-दूसरे का नाम तक नहीं लेते ! सब ''बोल बम'' हो जाते हैं ! शिवमय हो जाते हैं ! उनके बीच का फर्क मिट जाता है ! आपसी एकता, सहयोग, समानता की भावना मजबूत होती है ! पहचान, जाति, वर्ग सब तिरोहित हो जाते हैं ! हर कांवड़िया एक दूसरे का भाई बन जाता है !



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आज के लिए इतना ही 
मिलते हैं अगले अंक में।

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