मैं सोच-सोचकर परेशान हूँ आखिर उन ३-४-५ साल की
मासूम बच्चियों ने कैसे भड़काऊ वस्त्र पहने होगें, जो
अमानवीय कृत्य का शिकार हो गयीं। कैसी अदाएँ दिखायी
होंगी जो किसी को वासानात्मक रुप से उकसा गयी।
जिनको लड़की या लड़का का मतलब भी नहीं पता
वो मासूम तथाकथित मानसिक रूप से बीमार का
शिकार बन गयी। आये दिन पढ़ने-सुनने-देखने में
आने वाली ऐसी शर्मनाक,रोंगटे खड़े करने वाली घटनाओं
ने बहुत सारे सवाल खड़े किये हैं।
आखिर क्यों और कब तक समाज में ऐसे वीभत्स और
घिनौने चेहरों को बर्दाश्त किया जाता रहेगा???
मासूम बच्चियों ने कैसे भड़काऊ वस्त्र पहने होगें, जो
अमानवीय कृत्य का शिकार हो गयीं। कैसी अदाएँ दिखायी
होंगी जो किसी को वासानात्मक रुप से उकसा गयी।
जिनको लड़की या लड़का का मतलब भी नहीं पता
वो मासूम तथाकथित मानसिक रूप से बीमार का
शिकार बन गयी। आये दिन पढ़ने-सुनने-देखने में
आने वाली ऐसी शर्मनाक,रोंगटे खड़े करने वाली घटनाओं
ने बहुत सारे सवाल खड़े किये हैं।
आखिर क्यों और कब तक समाज में ऐसे वीभत्स और
घिनौने चेहरों को बर्दाश्त किया जाता रहेगा???
बड़े-बड़े भाषण देना, आक्रोश व्यक्त करना क्या ऐसी घटनाओं को रोकने में सक्षम है?
कृपया एक बार सोचिएगा अवश्य।
सादर अभिवादन
चलिए आज की रचनाओं की ओर
आदरणीया डॉ. इन्दिरा जी की कलम से बेहद मार्मिक रचना
सिकुड़ कर अखबार के
एक कॉलम को भर गई
पुराने अखबार में रात
एक ज़िंदगी लिपट गई !
आदरणीया यशोदा दी की कलम से बेहद खूबसूरत रचना
ठंडी हथेलियों को चूम
चाँदनी महक गयी
ओढ़ यादों की गरमाहट
लब मुस्कुराये
जैसे हो स्नेहिल स्पर्श तुम्हारा
आदरणीया अनीता जी की कलम से बेहद हृदयस्पर्शी रचना
सोना चाहता हूँ लंबी नींद ....
अब नहीं लगती ज़िन्दगी आसान...
ओ बिटिया....!
कर देना इतना-सा काम....!
टांग देना कोठरी में ...
एक अदना-सी मेरी तस्वीर.....!!!
आदरणीय रवींद्र जी की कलम से बेहद दिलकश रचना
लबों पर तिरती मुस्कराहट
उतर गयी दिल की गहराइयों में,
गुज़रने लगी तस्वीर-ए-तसव्वुर
एहसासों की अंगड़ाइयों में।
रत्ती भर भी छू सकूँ अपने मन के आवेग को,
जाल बुन सकूँ अनदेखे सपनों का,
चून लूँ, मन में प्रस्फुटित होते सारे कमल,
अर्थ दे पाऊँ अनियंत्रित लम्हों को,
न हो इंतजार किसी का, न हो हदें हसरतों की....
आदरणीय गगन जी की कलम से रोचक लेख
हर साल यहां 15 जून को विशाल मेला लगता है जिसमें देश-विदेश से भक्तजन यहां पधारकर अपनी श्रद्धा व आस्था को व्यक्त करते है। कहते है कि यहां पर श्रद्धा एवं विनयपूर्वक की गयी पूजा
कभी भी व्यर्थ नहीं जाती है।
आदरणीय विश्वमोहन जी की अद्भुत लेखनी से प्रसवित
समंदर!
उसे बाँहों में भरता।
लोट लोट मरता।
लहरों से सजाता।
सांय सांय की शहनाई बजाता
चौथे खंभे के पास ....
कह रहे थे...
एक असुर
हाथ में कुल्हाड़ी ले
काटता है
आदमी को
फिर जला देता है
डालकर पेट्रोल
और बनाता है वीडियो
आप सभी के बहुमूल्य सुझावों की प्रतीक्षा में







