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रविवार, 28 जून 2026

4787 ..यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।

 सादर अभिवादन 

ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है
यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।
मेरी पसंदीदा रचनाएं



हृदय में हाहाकार कैसा मृदुल अत्याचार
दर्द है, दुख है पर संभावना को न्योता है
मन ने किया समर्पण दिखला दी दर्पण
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है




हथौड़ा बजाते हुए बोला—
"वादी, प्रतिवादी, दोनों पक्षों की दलीलें और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि अभियुक्त निर्दोष है। अतः इसे सम्मान पूर्वक बरी किया जाता है।"

फैसला सुनाकर वह मुस्कराया, न्यायाधीश की कुर्सी से उतरा और एक बरीशुदा चोर की तरह अदालत से बाहर चला गया।




कमाल है ना, मोहब्बत समझने के लिए हम अपने दिल के तिलिस्म के भीतर उतरना चाहते हैं। ख़ुद को बेहतर समझने के लिए, अपनी सारी गुत्थियाँ खोलना चाहते हैं। जब कि मुहब्बत सा सबसे ज़रूरी फैक्टर होता है, भूगोल। कि तुम मेरे स्पेस में इर्द-गिर्द रहते ही नहीं तो मुझे तुम्हारे होने न होने से क्या ही फ़र्क़ पड़ना था।





बहुत स्वाभिमानी भी हूँ 
मगर नारी का अपमान हो ये सोचता भी नहीं 

स्त्री पुरुष तो हमसफ़र हैं जिंदगी के 
एक दूसरे के खिलाफ कभी भी नहीं



सादर समर्पित
सादर वंदन
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