सादर अभिवादन
डॉ. बशीर बद्र ..बिना बताए रुखसत हो गए
मशहूर है जो अचानक मौजूं हो उठा है-
‘उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दे
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।‘
हालांकि बशीर साहब के लिए यह शाम न जाने कितने बरसों से ढल ही रही थी, उनकी याद जा चुकी थी, जो मुशायरे वे लूटा करते थे, वे बीत चुके थे, उनकी शायरी लोगों के बीच थी, बस उनकी ज़ुबान पर नहीं थी, उनको देखने वाले मायूस हुआ करते थे कि ज़िंदगी ने उनके महबूब शायर के साथ क्या किया। लेकिन आखिरकार ये बाज़ी खत्म हुई। शायर चला गया, और हमारे पास उसकी शायरी बची हुई है- एक रोशनी की तरह, जिसमें हम अपनी भी शक्ल देख सकते हैं और अपना रास्ता भी पहचान सकते हैं।
रचनाएं
बातें कम होती गईं, सपने रूठ गए
खुद को, दुनिया भर के खूबसूरत दृश्यों को
आंखें देखतीं, पर उनमें ठहरता नहीं कुछ
मगर न रोई नहीं, न अफसोस किया
कुछ सुन रहे कुछ पढ़ रहे जो मिला
क्या सत्य क्या असत्य लगे अधखिला
परिवर्तन है नर्तन ताल अपनी दीजिए
दहन को वहन आप क्यों कीजिये
आज माँ नहीं है
फिर भी
नए कपड़े पहनते वक़्त
सोचता हूँ
आज पहनूँ
या तब
जब किसी बड़े के घर जाना हो
धान रोपते
खेतों में फिर
पायल छन छन बोलेगी,
ठंडी ठंडी पुरवा
फिर यादों की
खिड़की खोलेगी,
प्यासे पर्वत
झरनों का जल
पीकर गीत सुनाएंगे.
सादर समर्पित
सादर वंदन



